
अमेरिका की व्यापार नीति में छोटे मूल्य वाले आयातों से जुड़ी ‘डी मिनिमिस’ (de minimis) व्यवस्था लंबे समय से बहस का विषय रही है। इस व्यवस्था के तहत एक निश्चित सीमा तक मूल्य वाले विदेशी पैकेजों को अपेक्षाकृत सरल सीमा शुल्क प्रक्रिया और शुल्क से छूट मिलती थी। ट्रंप प्रशासन ने इसे व्यापार, सीमा सुरक्षा और अवैध तस्करी से जुड़ी गंभीर समस्या बताते हुए खत्म करने की दिशा में कदम उठाए। अब इस नीति को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में प्रशासन को अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड से महत्वपूर्ण समर्थन मिला है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को अपनी ‘America First Trade’ नीति की बड़ी सफलता के रूप में पेश किया है। उनका तर्क है कि डी मिनिमिस व्यवस्था का इस्तेमाल कुछ विदेशी शिपर्स द्वारा अमेरिकी बाजार में कम मूल्य वाले सामान भेजने, शुल्क से बचने और सीमा शुल्क जांच को अपेक्षाकृत कम करने के लिए किया जाता था। प्रशासन का दावा है कि इस व्यवस्था ने अवैध ड्रग्स, नकली उत्पादों और अन्य प्रतिबंधित सामान की तस्करी के लिए भी अवसर पैदा किए।
क्या है डी मिनिमिस व्यवस्था?
‘डी मिनिमिस’ एक अमेरिकी सीमा शुल्क व्यवस्था थी, जिसके तहत कम मूल्य के कुछ आयातों को शुल्क-मुक्त प्रवेश दिया जाता था। वर्ष 2016 में इसकी सीमा बढ़ाकर 800 डॉलर की गई थी। इसके बाद छोटे ऑनलाइन ऑर्डरों और अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स शिपमेंट में तेजी आई। अमेरिकी सरकार की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में इस व्यवस्था से अमेरिका को लगभग 10.8 अरब डॉलर के संभावित टैरिफ राजस्व से वंचित होना पड़ा।
इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना रहा है कि छोटे और सामान्य उपभोक्ता ऑर्डरों पर अत्यधिक कस्टम प्रक्रिया लागू करने से व्यापार महंगा और धीमा हो सकता है। दूसरी ओर, इसके आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक संख्या में छोटे पैकेजों की जांच करना कठिन होता है और इससे नियमों का दुरुपयोग संभव हो जाता है।
यही कारण है कि डी मिनिमिस व्यवस्था अमेरिकी व्यापार नीति में केवल टैक्स या टैरिफ का मुद्दा नहीं रही, बल्कि कस्टम्स प्रवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गई।
ट्रंप प्रशासन ने क्यों किया बदलाव?
ट्रंप प्रशासन ने 2025 से डी मिनिमिस व्यवस्था को सीमित करने और बाद में व्यापक रूप से निलंबित करने के कदम उठाए। शुरुआत में चीन और हांगकांग से आने वाले कुछ कम-मूल्य वाले सामानों पर कार्रवाई की गई। बाद में 30 जुलाई 2025 के कार्यकारी आदेश के जरिए सभी देशों से आने वाले पात्र वाणिज्यिक शिपमेंट के लिए व्यवस्था को व्यापक रूप से निलंबित करने का फैसला किया गया।
व्हाइट हाउस ने इसे टैरिफ चोरी रोकने, अमेरिकी उद्योगों की रक्षा करने और सीमा शुल्क व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। प्रशासन के अनुसार, कम मूल्य वाले पैकेजों की भारी संख्या ने कस्टम्स एजेंसियों के सामने निगरानी और जांच की चुनौती बढ़ाई थी।
2026 में भी प्रशासन ने इस नीति को जारी रखने के लिए कदम उठाए। 20 फरवरी 2026 के कार्यकारी आदेश में डी मिनिमिस शुल्क-मुक्त व्यवस्था को जारी रखने के बजाय उसके निलंबन को आगे बढ़ाया गया। आदेश में कहा गया कि संबंधित शिपमेंट पर लागू शुल्क और अन्य देयताओं की वसूली के लिए कस्टम्स व्यवस्था को लागू किया जाएगा।
अदालत में पहुंचा मामला
ट्रंप प्रशासन के फैसले के बाद आयातकों और व्यापार से जुड़े पक्षों ने अदालत का रुख किया। विवाद का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या राष्ट्रपति के पास मौजूदा कानून के तहत इस तरह की शुल्क-मुक्त व्यवस्था को निलंबित करने का अधिकार है।
यह विवाद उस व्यापक कानूनी बहस से भी जुड़ा है जिसमें राष्ट्रपति द्वारा आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के इस्तेमाल की सीमाओं पर सवाल उठाए गए हैं। फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अलग मामले में फैसला दिया था कि IEEPA कानून राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता। इसके बाद प्रशासन को टैरिफ नीति के कुछ हिस्सों के लिए वैकल्पिक कानूनी आधारों पर निर्भर होना पड़ा।
डी मिनिमिस व्यवस्था का मामला हालांकि अलग कानूनी प्रावधानों और कार्यकारी आदेशों से जुड़ा है। इसलिए इसे सीधे सभी टैरिफ विवादों के समान मानना उचित नहीं होगा।
कोर्ट के फैसले का महत्व
कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के फैसले को ट्रंप प्रशासन इसलिए महत्वपूर्ण मान रहा है क्योंकि इससे कम मूल्य वाले आयातों पर शुल्क-मुक्त व्यवस्था को खत्म करने की उसकी नीति को न्यायिक समर्थन मिला है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अदालत का फैसला अपने आप में अमेरिकी व्यापार नीति के हर पहलू पर अंतिम मुहर नहीं लगाता। डी मिनिमिस व्यवस्था से संबंधित अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न आगे भी उठ सकते हैं।
कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड अपने 2026 के फैसलों को सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध करता है और यह भी स्पष्ट करता है कि आधिकारिक रिकॉर्ड के लिए अदालत के CM/ECF दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिकी राजस्व पर संभावित असर
डी मिनिमिस व्यवस्था को खत्म करने का सबसे सीधा आर्थिक प्रभाव अमेरिकी सीमा शुल्क राजस्व पर पड़ सकता है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, केवल 2024 में इस व्यवस्था के कारण लगभग 10.8 अरब डॉलर का संभावित टैरिफ राजस्व नहीं मिला था।
सरकार का तर्क है कि यदि कम मूल्य वाले आयातों पर लागू शुल्क प्रभावी ढंग से वसूला जाता है, तो इससे सरकारी राजस्व बढ़ सकता है। ट्रंप प्रशासन इस अतिरिक्त राजस्व को अपनी व्यापक आर्थिक और कर नीतियों से जोड़कर देखता है।
हालांकि, वास्तविक आर्थिक प्रभाव केवल राजस्व तक सीमित नहीं होगा। आयातकों, ऑनलाइन विक्रेताओं, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी इसका असर पड़ सकता है। छोटे विदेशी पैकेजों पर शुल्क और अतिरिक्त कस्टम प्रक्रिया लागू होने से कुछ उत्पादों की कीमत या डिलीवरी लागत बढ़ सकती है।
ई-कॉमर्स उद्योग के लिए बड़ा बदलाव
डी मिनिमिस व्यवस्था के कारण अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों को अमेरिकी ग्राहकों तक छोटे पैकेज भेजने में सुविधा मिलती थी। इसके समाप्त होने से व्यापार मॉडल में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है।
कंपनियों को अब कस्टम्स नियमों, शुल्क भुगतान, दस्तावेजीकरण और आयात अनुपालन पर अधिक ध्यान देना होगा। इससे बड़ी कंपनियों की तुलना में छोटे ऑनलाइन विक्रेताओं पर अपेक्षाकृत अधिक प्रशासनिक बोझ पड़ने की संभावना है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी घरेलू उत्पादकों का तर्क है कि यदि विदेशी विक्रेता बिना शुल्क के अमेरिकी बाजार में सामान भेज सकते हैं, तो घरेलू कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है। इसलिए डी मिनिमिस नीति में बदलाव को कुछ अमेरिकी उद्योग समान प्रतिस्पर्धा की दिशा में कदम मानते हैं।
सुरक्षा का मुद्दा भी केंद्र में
ट्रंप प्रशासन ने डी मिनिमिस व्यवस्था को केवल आर्थिक समस्या नहीं माना। व्हाइट हाउस के अनुसार, कम मूल्य वाले शिपमेंट की भारी संख्या ने सीमा शुल्क निगरानी को चुनौतीपूर्ण बनाया और इसका इस्तेमाल अवैध गतिविधियों के लिए भी किया जा सकता था।
सरकार की 2026 की राष्ट्रीय ड्रग नियंत्रण रणनीति में भी डी मिनिमिस व्यवस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध ड्रग तस्करी के संदर्भ में चर्चा का विषय बनाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कम मूल्य वाले पैकेजों की संख्या में तेज वृद्धि ने निगरानी और प्रवर्तन के लिए अतिरिक्त चुनौतियां पैदा कीं।
फिर भी, किसी विशेष तस्करी चैनल के महत्व को लेकर सरकारी दावों और स्वतंत्र विश्लेषणों में अंतर हो सकता है। इसलिए इस नीति के सुरक्षा प्रभावों का आकलन करते समय आधिकारिक दावों को तथ्यात्मक रूप से अलग रखना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
अदालत के फैसले के बाद अब मुख्य सवाल यह है कि अमेरिकी प्रशासन डी मिनिमिस व्यवस्था के स्थान पर नई कस्टम्स प्रक्रिया को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करता है। यदि नई व्यवस्था बहुत जटिल होती है तो छोटे व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर लागत बढ़ सकती है। यदि इसे आधुनिक डिजिटल कस्टम्स प्रणाली के साथ लागू किया जाता है, तो सरकार का लक्ष्य राजस्व और निगरानी दोनों में सुधार करना हो सकता है।
व्हाइट हाउस ने 2026 में कस्टम्स सुधारों को भी अपनी व्यापार नीति का हिस्सा बनाया है। प्रशासन का कहना है कि आधुनिक प्रणाली, बेहतर अनुपालन और शुल्क वसूली अमेरिकी अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए जरूरी हैं।
निष्कर्ष
डी मिनिमिस व्यवस्था पर ट्रंप प्रशासन की नीति अमेरिका की ‘America First’ व्यापार रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। 800 डॉलर तक के कम मूल्य वाले आयातों को मिलने वाली पुरानी शुल्क-मुक्त सुविधा ने ई-कॉमर्स को बढ़ावा दिया, लेकिन इसके साथ सीमा शुल्क निगरानी, राजस्व और नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी सवाल उठे।
ट्रंप प्रशासन ने इस व्यवस्था को खत्म करने को अमेरिकी श्रमिकों, घरेलू उद्योग और सीमा सुरक्षा के हित में बताया है। कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड से मिला समर्थन इस नीति के लिए महत्वपूर्ण कानूनी उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि, आने वाले समय में इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नई व्यवस्था कितनी पारदर्शी, प्रभावी और व्यापार के लिए व्यावहारिक साबित होती है।
कुल मिलाकर, यह फैसला अमेरिकी व्यापार नीति में एक बड़े बदलाव की दिशा में संकेत देता है—जहां छोटे विदेशी शिपमेंट के लिए आसान शुल्क-मुक्त प्रवेश की जगह कस्टम्स अनुपालन, शुल्क वसूली और अधिक निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।
