भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2016 में शुरू किया गया प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) आज देश की सबसे प्रभावी स्वास्थ्य पहलों में से एक बन चुका है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान समय पर, गुणवत्तापूर्ण और निःशुल्क प्रसवपूर्व (Antenatal Care) स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है, ताकि गर्भावस्था से जुड़े जोखिमों की समय रहते पहचान कर उचित उपचार सुनिश्चित किया जा सके।
ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अभियान शुरू होने से अब तक 7.91 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल चुका है। साथ ही 1.24 करोड़ से अधिक हाई-रिस्क (उच्च जोखिम वाली) गर्भावस्थाओं की पहचान की गई है, जिससे समय रहते चिकित्सकीय हस्तक्षेप संभव हो पाया है। यह उपलब्धि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।
क्या है प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान?
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की शुरुआत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा इस उद्देश्य से की गई थी कि देश की प्रत्येक गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान कम से कम एक बार विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा स्वास्थ्य जांच उपलब्ध कराई जाए। इस अभियान के तहत हर महीने की 9 तारीख को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में विशेष प्रसवपूर्व जांच शिविर आयोजित किए जाते हैं।
इन शिविरों में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, फिजिशियन और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ गर्भवती महिलाओं की विस्तृत जांच करते हैं। जांच के आधार पर यदि किसी महिला की गर्भावस्था में कोई जोखिम पाया जाता है तो उसे विशेष निगरानी और आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जाता है।
करोड़ों महिलाओं तक पहुंचा अभियान
सरकार द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के अंतर्गत अब तक 7.91 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा चुकी हैं। यह संख्या दर्शाती है कि देशभर में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच लगातार मजबूत हुई है।
विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, दूरदराज के इलाकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की महिलाओं को इस अभियान से व्यापक लाभ मिला है। पहले जहां कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच नहीं करा पाती थीं, वहीं अब सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से उन्हें समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो रही है।
हाई-रिस्क गर्भावस्थाओं की समय रहते पहचान
गर्भावस्था के दौरान कई बार ऐसी चिकित्सकीय स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जो मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। इनमें उच्च रक्तचाप, गंभीर एनीमिया, मधुमेह, संक्रमण, भ्रूण की असामान्य स्थिति तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं शामिल हैं।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत अब तक 1.24 करोड़ से अधिक हाई-रिस्क गर्भावस्थाओं की पहचान की जा चुकी है। इन महिलाओं को विशेष चिकित्सा निगरानी, अतिरिक्त जांच, पोषण संबंधी सलाह तथा सुरक्षित संस्थागत प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराई गई।
समय पर जोखिम की पहचान होने से मातृ मृत्यु और नवजात मृत्यु के मामलों में कमी लाने में सहायता मिली है।
मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट
भारत ने पिछले एक दशक में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के अनुसार, देश की मातृ मृत्यु अनुपात (Maternal Mortality Ratio – MMR) वर्ष 2014-16 में प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 130 था, जो 2022-24 में घटकर 87 रह गया है।
इस प्रकार लगभग 43 अंकों की कमी दर्ज की गई है, जो भारत के लिए एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि मानी जा रही है।
मातृ मृत्यु दर में यह गिरावट कई कारणों का परिणाम है, जिनमें शामिल हैं—
- नियमित प्रसवपूर्व जांच
- संस्थागत प्रसव में वृद्धि
- प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की उपलब्धता
- समय पर जोखिम की पहचान
- बेहतर रेफरल व्यवस्था
- आपातकालीन प्रसूति सेवाओं का विस्तार
- पोषण एवं जागरूकता कार्यक्रम
पहली तिमाही में पंजीकरण बढ़ा
गर्भावस्था की पहली तिमाही में स्वास्थ्य पंजीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि शुरुआती महीनों में महिला की जांच हो जाती है तो संभावित जोखिमों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार—
- NFHS-4 (2015-16) में पहली तिमाही के दौरान प्रसवपूर्व पंजीकरण कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 58.6% था।
- NFHS-6 (2023-24) में यह बढ़कर 76.2% हो गया।
यह वृद्धि दर्शाती है कि महिलाओं में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ी है और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा भी मजबूत हुआ है।
ग्रामीण भारत में बढ़ा स्वास्थ्य नेटवर्क
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का सबसे अधिक लाभ ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में देखने को मिला है। आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी सेवाएं, एएनएम तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मिलकर गर्भवती महिलाओं की पहचान, पंजीकरण और नियमित जांच सुनिश्चित कर रहे हैं।
इसके अलावा डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, मोबाइल स्वास्थ्य सेवाओं और जनजागरूकता अभियानों ने भी इस कार्यक्रम की प्रभावशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अभियान के प्रमुख उद्देश्य
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का उद्देश्य केवल जांच कराना नहीं, बल्कि संपूर्ण मातृ स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके प्रमुख लक्ष्य हैं—
- प्रत्येक गर्भवती महिला को गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जांच उपलब्ध कराना।
- हाई-रिस्क गर्भावस्था की समय रहते पहचान करना।
- सुरक्षित संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना।
- मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में कमी लाना।
- गर्भवती महिलाओं को पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी परामर्श देना।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की खाई कम करना।
स्वास्थ्य प्रणाली को मिला नया आधार
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की भूमिका को और मजबूत किया है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की भागीदारी, नियमित जांच शिविर, आधुनिक जांच सुविधाएं और जोखिम आधारित चिकित्सा प्रबंधन ने इस अभियान को प्रभावी बनाया है।
इसके साथ ही आयुष्मान भारत, जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, पोषण अभियान तथा अन्य मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य योजनाओं के साथ समन्वय ने भी सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
भविष्य की चुनौतियां
हालांकि उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं, लेकिन अभी भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, गंभीर एनीमिया की रोकथाम, पोषण की कमी, किशोरियों के स्वास्थ्य में सुधार तथा सभी गर्भवती महिलाओं तक समय पर सेवाएं पहुंचाना भविष्य की प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।
इसके अलावा डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन, बेहतर रेफरल नेटवर्क और सामुदायिक स्वास्थ्य जागरूकता को और मजबूत करना आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने भारत में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा प्रदान की है। करोड़ों महिलाओं तक गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जांच पहुंचाने, लाखों हाई-रिस्क गर्भावस्थाओं की समय पर पहचान करने तथा मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने जैसी उपलब्धियां इस अभियान की सफलता को दर्शाती हैं।
पहली तिमाही में पंजीकरण बढ़ने, संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत होने और मातृ स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता से यह स्पष्ट है कि भारत सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य की ओर लगातार आगे बढ़ रहा है। यदि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य अवसंरचना, विशेषज्ञ सेवाओं और जनजागरूकता पर इसी प्रकार ध्यान दिया जाता रहा, तो देश मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बेहतर परिणाम हासिल कर सकता है।
