
भारत के समुद्री परिवहन और बंदरगाह क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। देश के प्रमुख बंदरगाहों पर जहाजों के टर्नअराउंड टाइम (Turnaround Time) में लगातार कमी आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021-22 में प्रमुख बंदरगाहों पर जहाजों का औसत टर्नअराउंड टाइम 52.87 घंटे था, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 48.84 घंटे रह गया। यह सुधार भारतीय बंदरगाहों की बढ़ती कार्यक्षमता, बेहतर प्रबंधन और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।
टर्नअराउंड टाइम क्या है?
टर्नअराउंड टाइम से आशय उस कुल समय से है, जो किसी जहाज को बंदरगाह पर पहुंचने से लेकर अपना निर्धारित परिचालन पूरा करके बंदरगाह से रवाना होने तक लगता है। इसमें जहाज के बंदरगाह में प्रवेश, बर्थिंग, माल की लोडिंग और अनलोडिंग, आवश्यक औपचारिकताएं तथा प्रस्थान जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
किसी बंदरगाह का टर्नअराउंड टाइम जितना कम होता है, सामान्य तौर पर उसकी परिचालन क्षमता उतनी ही बेहतर मानी जाती है। कम समय में अधिक जहाजों को संभाल पाना बंदरगाह की उत्पादकता बढ़ाता है और समुद्री व्यापार को गति देता है।
भारत जैसे विशाल समुद्री व्यापार वाले देश के लिए यह संकेतक विशेष महत्व रखता है। देश के आयात और निर्यात का एक बड़ा हिस्सा समुद्री मार्ग से होता है। ऐसे में बंदरगाहों पर जहाजों के लंबे समय तक खड़े रहने से व्यापार की लागत और लॉजिस्टिक समय दोनों बढ़ सकते हैं।
52.87 घंटे से 48.84 घंटे तक आया औसत समय
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021-22 में प्रमुख बंदरगाहों पर औसत टर्नअराउंड टाइम 52.87 घंटे था। वर्ष 2025-26 तक यह घटकर 48.84 घंटे हो गया। यानी इस अवधि में औसत समय में लगभग 4.03 घंटे की कमी दर्ज की गई।
प्रतिशत के लिहाज से देखें तो यह कमी लगभग 7.6 प्रतिशत बैठती है। यह बदलाव इस बात का संकेत देता है कि भारतीय प्रमुख बंदरगाह जहाजों को कम समय में संभालने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
हालांकि टर्नअराउंड टाइम में सुधार को केवल एक आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे, कार्गो हैंडलिंग सुविधाओं, डिजिटलीकरण, लॉजिस्टिक कनेक्टिविटी और परिचालन प्रक्रियाओं में हुए व्यापक बदलावों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
आधुनिक तकनीक से बढ़ी बंदरगाहों की क्षमता
बंदरगाहों की दक्षता बढ़ाने में आधुनिक तकनीक की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। डिजिटल प्रक्रियाओं के विस्तार से दस्तावेजी काम, माल की निगरानी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
ऑटोमेशन और आधुनिक कार्गो हैंडलिंग उपकरणों के इस्तेमाल से जहाजों से माल उतारने और माल चढ़ाने की प्रक्रिया को तेज करने में मदद मिलती है। इसके अलावा बंदरगाहों पर बेहतर प्लानिंग और रियल-टाइम सूचना प्रणाली जहाजों की आवाजाही तथा बर्थ के उपयोग को अधिक कुशल बनाने में सहायक होती है।
जहाज को बंदरगाह पर कम समय तक रोकना केवल बंदरगाह के लिए ही फायदेमंद नहीं होता, बल्कि इसका सीधा असर पूरे सप्लाई चेन पर पड़ता है।
व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है टर्नअराउंड टाइम?
भारत का वैश्विक व्यापार समुद्री परिवहन पर काफी निर्भर है। पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, लौह अयस्क, मशीनरी, कंटेनर कार्गो और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों का आयात-निर्यात समुद्री बंदरगाहों के माध्यम से होता है।
यदि जहाज बंदरगाह पर अधिक समय तक खड़ा रहता है तो जहाज संचालन की लागत बढ़ सकती है। दूसरी ओर, तेज टर्नअराउंड से जहाज कम समय में अपनी अगली यात्रा पर जा सकता है। इससे समुद्री परिवहन की समग्र उत्पादकता बढ़ती है।
बंदरगाहों की बेहतर दक्षता का असर आगे सड़क, रेल, गोदाम और अन्य लॉजिस्टिक सेवाओं पर भी पड़ता है। इसलिए टर्नअराउंड टाइम में कमी को भारत की व्यापक लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में सुधार के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
वैश्विक स्तर पर तुलना का महत्वपूर्ण पैमाना
बंदरगाहों की दक्षता का आकलन केवल घरेलू आंकड़ों से नहीं किया जाता। वैश्विक स्तर पर भी विभिन्न संस्थाएं बंदरगाहों के प्रदर्शन की तुलना करती हैं। इनमें विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित Container Port Performance Index (CPPI) एक महत्वपूर्ण सूचकांक है।
CPPI कंटेनर बंदरगाहों के प्रदर्शन का तुलनात्मक मूल्यांकन करता है और इसमें जहाजों द्वारा बंदरगाह पर बिताए गए समय को महत्वपूर्ण आधार बनाया जाता है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों और क्षेत्रों के कंटेनर बंदरगाहों के प्रदर्शन को एक तुलनात्मक ढांचे में समझने में मदद करना है।
इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भारत के बंदरगाहों के प्रदर्शन को वैश्विक संदर्भ में देखने का अवसर प्रदान करते हैं। इससे उन क्षेत्रों की पहचान करने में भी सहायता मिल सकती है, जहां आगे और सुधार की आवश्यकता है।
बंदरगाहों के आधुनिकीकरण से मिल रहा लाभ
भारत सरकार द्वारा बंदरगाह क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, क्षमता बढ़ाने और परिचालन प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। बड़े जहाजों को संभालने की क्षमता, आधुनिक कार्गो हैंडलिंग सिस्टम, बेहतर कनेक्टिविटी और डिजिटल सेवाएं बंदरगाहों की समग्र कार्यक्षमता को प्रभावित करती हैं।
प्रमुख बंदरगाहों के प्रदर्शन में सुधार का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बंदरगाहों को केवल माल चढ़ाने-उतारने के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित किया जा रहा है।
जहाज के बंदरगाह पर पहुंचने के बाद उसकी प्रक्रिया जितनी सुचारू होगी, उतनी ही तेजी से माल आगे बढ़ेगा। इससे आपूर्ति श्रृंखला में समय की बचत हो सकती है।
भविष्य की चुनौतियां भी महत्वपूर्ण
हालांकि टर्नअराउंड टाइम में सुधार उत्साहजनक है, लेकिन वैश्विक समुद्री व्यापार की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए लगातार सुधार की आवश्यकता बनी रहेगी। वैश्विक व्यापार में उतार-चढ़ाव, बड़े आकार के जहाजों का संचालन, कंटेनर यातायात में बदलाव और नई लॉजिस्टिक आवश्यकताएं बंदरगाहों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं।
इसके अलावा केवल औसत राष्ट्रीय आंकड़ा पर्याप्त नहीं है। अलग-अलग बंदरगाहों के प्रदर्शन में अंतर हो सकता है। इसलिए बंदरगाह-वार आंकड़ों का विश्लेषण करके कमजोर क्षेत्रों की पहचान करना और उनके अनुसार सुधारात्मक कदम उठाना महत्वपूर्ण होगा।
समुद्री अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई गति
भारत सरकार की समुद्री क्षेत्र से जुड़ी नीतियों का व्यापक उद्देश्य देश को एक अधिक प्रतिस्पर्धी और कुशल समुद्री व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करना है। इसके लिए बंदरगाहों की क्षमता, कनेक्टिविटी और परिचालन दक्षता में सुधार आवश्यक है।
2021-22 से 2025-26 के बीच टर्नअराउंड टाइम का 52.87 घंटे से 48.84 घंटे तक आना इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। लगभग चार घंटे की औसत बचत हजारों जहाजों के स्तर पर देखी जाए तो इसका संचयी प्रभाव काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
भारत के प्रमुख बंदरगाहों पर जहाजों के औसत टर्नअराउंड टाइम में आई कमी समुद्री परिवहन क्षेत्र की बढ़ती परिचालन दक्षता को दर्शाती है। 2021-22 के 52.87 घंटे से घटकर 2025-26 में 48.84 घंटे होना लगभग 7.6 प्रतिशत सुधार को दर्शाता है।
वहीं, विश्व बैंक का Container Port Performance Index वैश्विक स्तर पर कंटेनर बंदरगाहों के प्रदर्शन की तुलनात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है। आने वाले वर्षों में भारत के लिए चुनौती केवल टर्नअराउंड टाइम को और कम करना नहीं, बल्कि सभी प्रमुख बंदरगाहों में समान रूप से उच्च दक्षता सुनिश्चित करना होगी।
तेज, आधुनिक और तकनीक आधारित बंदरगाह भारत के आयात-निर्यात कारोबार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स लागत और समय को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए बंदरगाहों की कार्यक्षमता में सुधार भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक अहम आधार बनता जा रहा है।
