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मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान: इस गणेशोत्सव अपनाएं स्वदेशी और पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के नवीनतम संस्करण में देशवासियों से आगामी गणेशोत्सव को पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों के प्रोत्साहन और स्थानीय कारीगरों के सम्मान के साथ मनाने का भावनात्मक और प्रेरणादायक आह्वान किया। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि इस वर्ष प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी प्रतिमाओं के स्थान पर देश की मिट्टी से निर्मित भगवान श्री गणेश की प्रतिमाओं को अपनाएं और स्थानीय कुम्हारों एवं शिल्पकारों द्वारा तैयार की गई मूर्तियों को प्राथमिकता दें।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल पर्व मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और आत्मनिर्भरता की भावना को भी मजबूत करती है। ऐसे में यदि गणेशोत्सव जैसे बड़े पर्व को पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी अभियान से जोड़ा जाए तो यह पूरे देश के लिए एक सकारात्मक संदेश बन सकता है।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा संदेश

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियां जलाशयों में विसर्जन के बाद लंबे समय तक घुलती नहीं हैं और नदियों, तालाबों तथा झीलों के जल को प्रदूषित करती हैं। इन प्रतिमाओं में प्रयुक्त रासायनिक रंग जलीय जीवों और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

इसके विपरीत, प्राकृतिक मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं पानी में आसानी से घुल जाती हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे इस बार मिट्टी की प्रतिमाओं को अपनाकर प्रकृति की रक्षा में अपना योगदान दें।

‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा बल

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि त्योहार केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी अवसर हैं।

उन्होंने कहा कि यदि लोग स्थानीय कुम्हारों, मूर्तिकारों और शिल्पकारों द्वारा बनाई गई गणेश प्रतिमाएं खरीदेंगे तो इससे लाखों परिवारों की आजीविका मजबूत होगी। गांवों और छोटे शहरों के कारीगरों को नए अवसर मिलेंगे तथा पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलेगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर भारतीय का छोटा-सा निर्णय देश के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की अपील

प्रधानमंत्री ने केवल गणेश प्रतिमाओं तक ही सीमित न रहते हुए लोगों से आग्रह किया कि वे गणेशोत्सव के दौरान पूजा सामग्री, सजावट, दीपक, रंगोली, हस्तशिल्प और अन्य आवश्यक वस्तुओं में भी स्वदेशी एवं स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें।

उन्होंने कहा कि जब नागरिक स्थानीय उत्पाद खरीदते हैं तो उसका लाभ सीधे देश के छोटे उद्यमियों, कारीगरों और स्वरोजगार से जुड़े परिवारों तक पहुंचता है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

संस्कृति और प्रकृति का संतुलन

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देती आई है। हमारे पर्व केवल उत्सव नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी का भी माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प ले तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

स्थानीय कारीगरों के लिए नया अवसर

देशभर में हजारों कुम्हार और शिल्पकार महीनों पहले से गणेश प्रतिमाओं के निर्माण में जुट जाते हैं। मिट्टी की प्रतिमाओं की बढ़ती मांग से इन कारीगरों की आय में वृद्धि होगी और उनकी पारंपरिक कला को नया जीवन मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नागरिक बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर बनी प्रतिमाओं को अपनाते हैं तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

जनभागीदारी से सफल होगा अभियान

प्रधानमंत्री ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं, सामाजिक संगठनों, धार्मिक समितियों और गणेशोत्सव मंडलों से अपील की कि वे इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप दें।

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने आसपास भी दूसरों को पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं के उपयोग के लिए प्रेरित करें और स्वच्छ भारत, हरित भारत तथा आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत करें।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संदेश केवल गणेशोत्सव मनाने की अपील नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों के सम्मान, स्थानीय कारीगरों के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का व्यापक आह्वान है। यदि देशवासी मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं को अपनाते हैं और स्थानीय शिल्पकारों का समर्थन करते हैं, तो यह गणेशोत्सव आस्था के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण और राष्ट्रनिर्माण का भी उत्सव बन सकता है।

इस वर्ष का गणेशोत्सव केवल भगवान श्री गणेश की आराधना का अवसर नहीं, बल्कि “वोकल फॉर लोकल”, “स्वदेशी अपनाओ” और “पर्यावरण बचाओ” के राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने का भी महत्वपूर्ण पर्व बन सकता है।

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