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राजधानी के स्कूलों की बदहाली पर बड़ा सवाल: बुनियादी शिक्षा मजबूत किए बिना कैसे साकार होगा ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का सपना?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश को आर्थिक रूप से देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करने के लिए बड़े लक्ष्य तय किए जा रहे हैं। एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना, औद्योगिक निवेश, नए एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, स्मार्ट सिटी, लॉजिस्टिक हब और बड़े कारोबारी प्रोजेक्ट प्रदेश की विकास यात्रा की तस्वीर पेश करते हैं। निश्चित रूप से आर्थिक विस्तार और आधारभूत ढांचे का निर्माण किसी भी राज्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।

लेकिन विकास की इस कहानी के बीच एक ऐसा सवाल है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—क्या आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की रफ्तार के साथ सरकारी स्कूलों की बुनियादी स्थिति भी सुधर रही है?

राजधानी क्षेत्र के किसी विद्यालय में जर्जर भवन, खराब शौचालय, पर्याप्त फर्नीचर का अभाव, पेयजल की समस्या, बिजली या अन्य आवश्यक सुविधाओं की कमी सामने आती है, तो यह केवल एक स्कूल की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे शिक्षा तंत्र की प्राथमिकताओं और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। आखिर आज के विद्यार्थी ही कल के इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी, प्रशासनिक अधिकारी और कुशल कर्मचारी बनेंगे। यदि उनकी शिक्षा की नींव कमजोर होगी, तो मजबूत अर्थव्यवस्था की इमारत कितनी टिकाऊ होगी?

आर्थिक विकास के साथ शिक्षा भी हो प्राथमिकता

किसी राज्य की आर्थिक शक्ति केवल कारखानों, सड़कों और निवेश की राशि से निर्धारित नहीं होती। वास्तविक विकास तब माना जाता है, जब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और लोगों की क्षमताओं का विकास हो।

उत्तर प्रदेश की विशाल आबादी को देखते हुए शिक्षा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। लाखों बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों से आती है, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम हैं।

ऐसे में स्कूल की चारदीवारी के भीतर मौजूद परिस्थितियां सीधे प्रदेश के भविष्य से जुड़ जाती हैं। यदि विद्यार्थी को साफ वातावरण, सुरक्षित भवन, पर्याप्त रोशनी, बैठने की उचित व्यवस्था और स्वच्छ पेयजल जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो पढ़ाई का वातावरण प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसलिए आर्थिक लक्ष्यों की चर्चा करते समय शिक्षा के बुनियादी ढांचे को भी विकास के केंद्रीय एजेंडे में रखना जरूरी है।

स्कूल की इमारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका वातावरण

अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत विद्यालयों में भवन निर्माण, रंगाई-पुताई या अन्य कार्यों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन किसी स्कूल की गुणवत्ता का आकलन केवल उसके बाहरी स्वरूप से नहीं किया जा सकता।

एक आदर्श विद्यालय वह है, जहां बच्चे सुरक्षित महसूस करें और शिक्षक बेहतर तरीके से पढ़ा सकें। इसके लिए पर्याप्त कक्षाएं, मजबूत भवन, उचित फर्नीचर, स्वच्छ शौचालय, नियमित बिजली, पंखे, साफ पानी और पढ़ाई से जुड़ी आवश्यक सामग्री जैसी सुविधाएं जरूरी हैं।

इसके अलावा पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला, कंप्यूटर और खेलकूद की व्यवस्था विद्यार्थियों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हर विद्यालय में सभी सुविधाएं एक समान स्तर पर उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अभाव किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं माना जाना चाहिए।

राजधानी क्षेत्र की तस्वीर ज्यादा जिम्मेदारी मांगती है

राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां सरकारी विभागों, वरिष्ठ अधिकारियों और विभिन्न निगरानी तंत्र की मौजूदगी रहती है। ऐसे क्षेत्र में यदि किसी सरकारी विद्यालय की मूलभूत व्यवस्था को लेकर सवाल उठते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के लिए यह प्राथमिकता का विषय होना चाहिए।

सिर्फ रिपोर्ट तैयार कर देना या समस्या सामने आने के बाद आश्वासन देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि अधिकारी विद्यालयों का वास्तविक निरीक्षण करें और यह पता लगाएं कि जमीन पर परिस्थितियां क्या हैं।

कई बार कागजों में सुविधा उपलब्ध दिखाई देती है, लेकिन उसका इस्तेमाल संभव नहीं होता। उदाहरण के लिए शौचालय बना हुआ हो, लेकिन उसमें पानी की व्यवस्था न हो; हैंडपंप मौजूद हो, लेकिन खराब पड़ा हो; कमरों की संख्या पर्याप्त हो, लेकिन फर्नीचर की कमी हो। ऐसी परिस्थितियों में केवल सरकारी रिकॉर्ड को उपलब्धि मान लेना वास्तविक स्थिति का सही आकलन नहीं होगा।

बच्चों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए

विद्यालयों की निगरानी करते समय बच्चों और अभिभावकों की राय को भी महत्व दिया जाना चाहिए। विद्यार्थी रोजाना स्कूल में रहते हैं और उन्हें पता होता है कि वहां किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

इसी तरह शिक्षक भी विद्यालय की वास्तविक चुनौतियों से परिचित होते हैं। यदि किसी स्कूल में भवन की समस्या है, शिक्षण सामग्री की कमी है या मूलभूत सुविधा काम नहीं कर रही है, तो शिक्षक और अभिभावक प्रशासन को इसकी जानकारी दे सकते हैं।

इसलिए स्कूल निरीक्षण की प्रक्रिया केवल कागजी जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर प्राप्त शिकायतों और सुझावों को भी रिकॉर्ड करके उनके समाधान की समयसीमा तय की जानी चाहिए।

निवेश के साथ मानव पूंजी में निवेश जरूरी

ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य केवल आंकड़ों का विषय नहीं है। ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित और शिक्षित युवाओं की आवश्यकता होगी। उद्योगों को इंजीनियर, तकनीशियन, प्रबंधक, शोधकर्ता, स्वास्थ्यकर्मी और अन्य कुशल पेशेवर चाहिए होंगे।

यदि स्कूली शिक्षा की नींव मजबूत होगी, तो आगे चलकर उच्च शिक्षा और कौशल विकास के रास्ते भी बेहतर होंगे। इसके विपरीत यदि बड़ी संख्या में बच्चे गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, तो भविष्य में कुशल मानव संसाधन तैयार करने की चुनौती बढ़ सकती है।

यही कारण है कि शिक्षा पर खर्च को केवल सरकारी बजट का एक हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक क्षमता में निवेश के रूप में देखना चाहिए।

योजनाओं के साथ परिणाम की निगरानी जरूरी

सरकारें समय-समय पर विद्यालयों के विकास के लिए अलग-अलग योजनाएं चलाती हैं। भवन निर्माण से लेकर शौचालय, पेयजल, डिजिटल शिक्षा और अन्य सुविधाओं तक के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। लेकिन किसी भी योजना की सफलता का वास्तविक प्रमाण उसके परिणाम से मिलता है।

जरूरत है कि विद्यालयों की स्थिति की नियमित और पारदर्शी समीक्षा हो। किस स्कूल में क्या सुविधा उपलब्ध है, कौन-सी व्यवस्था खराब है और किस समस्या के समाधान के लिए कितना समय लगेगा—इन सभी पहलुओं की निगरानी की जानी चाहिए।

जहां लापरवाही मिले, वहां जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि समस्या सामने आने के बाद सुधार केवल कागजों में न हो, बल्कि उसका लाभ विद्यार्थियों को वास्तविक रूप से मिले।

शिक्षा मजबूत होगी तो अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी

उत्तर प्रदेश के लिए बड़े आर्थिक लक्ष्य हासिल करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। उद्योग, निवेश और आधारभूत ढांचा रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकते हैं। लेकिन इन सभी क्षेत्रों को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए शिक्षित और कुशल मानव संसाधन अनिवार्य है।

इसलिए विकास की तस्वीर में चमकते एक्सप्रेसवे और आधुनिक परियोजनाओं के साथ सरकारी स्कूल की साफ कक्षा, सुरक्षित भवन, काम करता पंखा, स्वच्छ शौचालय और उपलब्ध पुस्तकें भी दिखाई देनी चाहिए।

ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का सपना तभी टिकाऊ बन सकता है, जब उसकी नींव मजबूत मानव पूंजी पर रखी जाए। और मानव पूंजी की पहली प्रयोगशाला स्कूल ही है।

राजधानी क्षेत्र के किसी विद्यालय की बदहाल स्थिति इसलिए केवल एक स्थानीय खबर नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं पर विचार करने का अवसर है। जरूरत इस बात की है कि बड़े आर्थिक दावों के साथ छोटे लेकिन बुनियादी सवालों को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए।

आखिर किसी प्रदेश की असली तरक्की केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वहां कितने बड़े निवेश आए, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वहां पढ़ने वाला एक सामान्य बच्चा कितनी सुरक्षित, सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ अपने भविष्य की शुरुआत कर पा रहा है।

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