📅 तारीख: 12 जुलाई 2025
📍 स्थान: नई दिल्ली
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में दखल देते हुए एक पिता-पुत्र द्वारा दाखिल याचिका पर संज्ञान लिया है, जिसमें दुष्कर्म के एक मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने इस एफआईआर को “दुर्भावनापूर्ण अभियोजन” (malicious prosecution) का उदाहरण बताया है और आरोप लगाया है कि यह शिकायत आपसी संबंधों के बिगड़ने के बाद उत्पन्न निजी विवादों का परिणाम है।
यह मामला भर्तीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyaya Sanhita – BNS) 2023 के तहत दर्ज हुआ था, जिसमें संबंधित धाराएं 64(2), 79, 123 और 351(2) हैं। एफआईआर महिला शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें राहुल यादव नामक युवक पर बलात्कार, आपराधिक धमकी और अन्य गंभीर अपराधों का आरोप लगाया गया है।
🧑⚖️ न्यायालय की प्रतिक्रिया
न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की एकल पीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर 2025 के लिए सूचीबद्ध की है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुणाल यादव और कर्तिकेय यादव ने अदालत में दलील दी कि यह मामला सहमति से चल रहे एक प्रेम संबंध के टूटने के बाद बदले की भावना से दर्ज किया गया है।
💬 याचिकाकर्ता का पक्ष
राहुल यादव, जो कि एक युवा अधिवक्ता और न्यायिक सेवा का अभ्यर्थी है, ने अपनी याचिका में दावा किया कि वह सितंबर 2023 से महिला के साथ एक प्रेमपूर्ण और सहमति-आधारित रिश्ते में था। दोनों जगतपुरी इलाके में एक ही मकान में अलग-अलग किराए के कमरों में रहते थे। याचिका के अनुसार, उनका पहला शारीरिक संबंध 22 सितंबर 2023 को पूरी सहमति से हुआ था।
इसके बाद फरवरी 2024 में राहुल ने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे महिला के परिवार ने कथित रूप से जातिसूचक टिप्पणियों के साथ ठुकरा दिया और राहुल को झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी।
📱 डिजिटल साक्ष्य
याचिकाकर्ता ने अपने बचाव में अदालत को व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और एसएमएस के स्क्रीनशॉट भी सौंपे हैं, जो कथित रूप से यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति और संवाद मौजूद था। इन डिजिटल संदेशों को इस मामले में एक निर्णायक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
⚖️ न्याय और सामाजिक संदर्भ
यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि सामाजिक और जातीय संदर्भ में भी गंभीर बहस का विषय बन गया है। आरोप है कि जातिगत भेदभाव और वित्तीय असहमति इस मामले के मूल में है, जिससे न्याय की प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगे हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह कदम न्यायिक पारदर्शिता और दुरुपयोग के विरुद्ध संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगामी सुनवाई में दोनों पक्ष क्या साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करते हैं, और न्यायपालिका इस पेचीदा मामले में किस दिशा में निर्णय लेती है।
