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जलीय जिंक बैटरियों को टिकाऊ और किफायती बनाने की दिशा में बड़ी सफलता, इलेक्ट्रोलाइट अभियांत्रिकी से मिलेगा नया आयाम

नई दिल्ली। ऊर्जा भंडारण (Energy Storage) के क्षेत्र में भारत के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने एक नए विकसित इलेक्ट्रोलाइट संयोजी (Electrolyte Additive) के माध्यम से जलीय जिंक-आयन बैटरियों (Aqueous Zinc-Ion Batteries – AZIBs) की सुरक्षा, दक्षता और आयु बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। यह तकनीक भविष्य में अधिक सुरक्षित, लंबे समय तक चलने वाली और कम लागत वाली पुनर्भरणीय (Rechargeable) बैटरियों के विकास को गति दे सकती है।

यह शोध विशेष रूप से उन चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित है, जो अब तक जलीय जिंक-आयन बैटरियों के व्यावसायिक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा रही हैं।

जलीय जिंक-आयन बैटरियां क्यों हैं महत्वपूर्ण?

आज दुनिया में सबसे अधिक उपयोग होने वाली बैटरियां लिथियम-आयन बैटरियां हैं, लेकिन इनमें लागत अधिक होती है और सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बने रहते हैं। इसके विपरीत जलीय जिंक-आयन बैटरियां (AZIBs) कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करती हैं।

इनकी प्रमुख विशेषताएं हैं—

इन्हीं कारणों से AZIBs को भविष्य की ऊर्जा भंडारण तकनीकों का एक मजबूत विकल्प माना जा रहा है।

व्यावसायीकरण में क्या थीं प्रमुख चुनौतियां?

हालांकि इन बैटरियों में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इनके व्यापक उपयोग के सामने कई तकनीकी समस्याएं मौजूद थीं।

1. जिंक डेंड्राइट (Zinc Dendrites) का निर्माण

चार्जिंग के दौरान जिंक की सतह पर सुई जैसी संरचनाएं बनने लगती हैं, जिन्हें जिंक डेंड्राइट कहा जाता है। ये बैटरी के अंदर शॉर्ट सर्किट पैदा कर सकती हैं, जिससे बैटरी की क्षमता और सुरक्षा दोनों प्रभावित होती हैं।

2. हाइड्रोजन उत्सर्जन अभिक्रिया (Hydrogen Evolution Reaction – HER)

जल आधारित इलेक्ट्रोलाइट के कारण चार्जिंग के दौरान हाइड्रोजन गैस बनने लगती है। इससे ऊर्जा की हानि होती है और बैटरी की कार्यक्षमता घट जाती है।

3. संक्षारण (Corrosion)

जिंक इलेक्ट्रोड धीरे-धीरे संक्षारित होने लगता है, जिससे बैटरी का जीवनकाल कम हो जाता है।

4. खराब चक्रीय स्थिरता (Poor Cycling Stability)

लगातार चार्ज और डिस्चार्ज होने पर बैटरी की क्षमता तेजी से घटती है, जिससे लंबे समय तक उपयोग संभव नहीं हो पाता।

इलेक्ट्रोलाइट अभियांत्रिकी से मिला समाधान

वैज्ञानिकों ने इन समस्याओं का समाधान इलेक्ट्रोलाइट अभियांत्रिकी (Electrolyte Engineering) के माध्यम से खोजा है।

शोध में विकसित किए गए नए इलेक्ट्रोलाइट संयोजी से जिंक इलेक्ट्रोड और इलेक्ट्रोलाइट के बीच बनने वाले इंटरफ़ेस को अधिक स्थिर बनाया गया है। इससे—

इंटरफ़ेस अभियांत्रिकी पर आधारित नई सोच

इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें महंगी नई सामग्रियां विकसित करने के बजाय इंटरफ़ेस अभियांत्रिकी (Interface Engineering) को अपनाया गया है।

अर्थात, वैज्ञानिकों ने मौजूदा बैटरी प्रणाली में केवल इलेक्ट्रोलाइट के व्यवहार को नियंत्रित करके बेहतर प्रदर्शन प्राप्त किया। इससे तकनीक अधिक व्यावहारिक, कम लागत वाली और औद्योगिक स्तर पर अपनाने योग्य बन सकती है।

भविष्य में क्या होंगे लाभ?

यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो इसके अनेक क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं—

भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत स्वच्छ ऊर्जा और नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऊर्जा भंडारण की सुरक्षित, किफायती और टिकाऊ तकनीक विकसित करना इस लक्ष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

जलीय जिंक-आयन बैटरियों में यह नई प्रगति भारत को बैटरी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ स्वदेशी ऊर्जा भंडारण समाधानों के विकास को भी नई गति प्रदान कर सकती है।

निष्कर्ष

इलेक्ट्रोलाइट अभियांत्रिकी पर आधारित यह नवीन शोध जलीय जिंक-आयन बैटरियों के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। महंगी सामग्रियों के बजाय इंटरफ़ेस सुधार पर आधारित यह दृष्टिकोण न केवल बैटरियों की सुरक्षा, स्थायित्व और दक्षता बढ़ाता है, बल्कि उन्हें व्यावसायिक रूप से अधिक व्यवहार्य भी बनाता है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक ऊर्जा भंडारण, विद्युत परिवहन और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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