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जेएनएस इंटरनेशनल पॉलिसी समिट 2026 में नेतन्याहू का स्पष्ट संदेश: सुरक्षा से कोई समझौता नहीं

यरुशलम में आयोजित जेएनएस इंटरनेशनल पॉलिसी समिट 2026 के दौरान इज़राइल के प्रधानमंत्री ने देश की सुरक्षा नीति को लेकर बेहद स्पष्ट और सख्त रुख प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दक्षिणी लेबनान में इज़राइली रक्षा बल (आईडीएफ) की तैनाती तब तक जारी रहेगी, जब तक ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह से उत्पन्न खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता। उनके अनुसार, इज़राइल अपनी सीमाओं और नागरिकों की सुरक्षा के मुद्दे पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

यरुशलम में जुटे वैश्विक नीति विशेषज्ञ

21 से 23 जून 2026 के बीच आयोजित जेएनएस इंटरनेशनल पॉलिसी समिट में कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हस्तियों, रणनीतिक विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। सम्मेलन में इज़राइल के राष्ट्रपति , अमेरिकी प्रतिनिधियों और सुरक्षा मामलों के जानकारों ने मध्य पूर्व की बदलती परिस्थितियों, अमेरिका-इज़राइल संबंधों और क्षेत्रीय चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। इस मंच का उद्देश्य सुरक्षा और कूटनीतिक सहयोग को लेकर साझा रणनीति तैयार करना था।

लेबनान में सैन्य उपस्थिति पर दोहराया रुख

अपने संबोधन में नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल की कार्रवाई किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि उन संगठनों के विरुद्ध है जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिज़्बुल्लाह की गतिविधियों को देखते हुए दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है और जब तक यह खतरा समाप्त नहीं होता, तब तक इज़राइल पीछे हटने के पक्ष में नहीं है।

अमेरिका का उदाहरण देकर रखा पक्ष

प्रधानमंत्री ने अपने तर्क को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि किसी अन्य देश, विशेषकर अमेरिका, की सीमाओं पर लगातार मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए जाते, तो वह भी अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कठोर कदम उठाता। उनका कहना था कि इज़राइल वही कर रहा है जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र की जिम्मेदारी होती है।

नागरिकों की सुरक्षा को लेकर दावा

नेतन्याहू ने इज़राइली सेना की कार्रवाई को अत्यधिक सटीक बताते हुए कहा कि सेना का उद्देश्य केवल आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाना है। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अभियानों के दौरान नागरिक हानि को न्यूनतम रखने के लिए विशेष सावधानी बरती जाती है। हालांकि, युद्ध क्षेत्रों में हताहतों के आंकड़ों और उनके अनुपात को लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और स्वतंत्र स्रोतों के अलग-अलग आकलन भी सामने आते रहे हैं।

ईरान और उसके समर्थित संगठनों पर चिंता

भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि क्षेत्र में अस्थिरता का मुख्य कारण ईरान और उसके समर्थित संगठन हैं। उन्होंने हिज़्बुल्लाह को सीधे ईरानी प्रभाव से जुड़ा बताते हुए कहा कि इज़राइल का संघर्ष लेबनान की जनता से नहीं, बल्कि उन समूहों से है जो उसकी सुरक्षा को चुनौती देते हैं।

अमेरिका-इज़राइल साझेदारी पर जोर

सम्मेलन में मौजूद अमेरिकी प्रतिनिधियों और अन्य नेताओं ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। सुरक्षा, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर अमेरिका और इज़राइल के संबंधों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

क्षेत्रीय शांति के लिए सुरक्षा को बताया प्राथमिक शर्त

इज़राइल की ओर से यह संकेत दिया गया कि स्थायी शांति तभी संभव है जब आतंकवादी गतिविधियों और सशस्त्र संगठनों के प्रभाव को समाप्त किया जाए। नेतन्याहू के भाषण से यह संदेश भी सामने आया कि इज़राइल सैन्य, कूटनीतिक और वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है।

व्यापक राजनीतिक संदेश

विश्लेषकों के अनुसार, यह संबोधन केवल घरेलू जनता के लिए नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक संकेत था कि इज़राइल अपनी सुरक्षा नीति में कठोर रुख बनाए रखने के पक्ष में है। आने वाले समय में इस नीति का प्रभाव मध्य पूर्व की राजनीति, क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर देखने को मिल सकता है।

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