
प्रस्तावना
भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना में कृषि का स्थान हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है। लेकिन आज भारतीय कृषि केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रह गई है। उत्पादकता में सुधार, सिंचाई और संस्थागत ऋण की पहुंच, फसल बीमा, डिजिटल तकनीक, किसान उत्पादक संगठनों यानी FPOs और पशुपालन, डेयरी, मत्स्यपालन तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे संबद्ध क्षेत्रों के विस्तार ने कृषि को एक व्यापक आर्थिक गतिविधि में बदलने की दिशा में गति दी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन यानी GVA वर्ष 2014-15 के करीब 20.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 48.7 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं 2024-25 में खाद्यान्न उत्पादन 357.73 मिलियन टन तक पहुंचा। ये आंकड़े कृषि क्षेत्र के बढ़ते आर्थिक महत्व और उत्पादन क्षमता की तस्वीर पेश करते हैं।
खेती से आगे बढ़ रही कृषि अर्थव्यवस्था
भारतीय कृषि में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि किसान की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल फसल उत्पादन तक सीमित देखने के बजाय कृषि से जुड़े दूसरे क्षेत्रों को भी महत्व दिया जा रहा है। पशुपालन, डेयरी, मत्स्यपालन, बागवानी, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि-आधारित उद्यम ग्रामीण आय के वैकल्पिक स्रोत बन रहे हैं।
कई छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह विविधीकरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। फसल आधारित आय मौसम और बाजार परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है, जबकि पशुपालन या डेयरी जैसी गतिविधियां आय के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध करा सकती हैं। सरकार ने भी संबद्ध क्षेत्रों को कृषि विकास की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
इस बदलाव का व्यापक प्रभाव ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ सकता है। यदि किसान केवल कच्ची उपज बेचने के बजाय प्रसंस्करण, पैकेजिंग और स्थानीय मूल्यवर्धन से जुड़ते हैं, तो एक ही कृषि उत्पाद से ग्रामीण क्षेत्र में कई प्रकार की आर्थिक गतिविधियां पैदा हो सकती हैं।
उत्पादकता बढ़ाने पर जोर
कृषि के नए दौर में केवल अधिक जमीन पर खेती करना लक्ष्य नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों से अधिक और बेहतर उत्पादन प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए आधुनिक सिंचाई, उन्नत बीज, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कृषि मशीनरी और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ जैसी पहलें पानी के अधिक कुशल उपयोग पर जोर देती हैं। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकें पानी की बचत के साथ खेती की उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। इसके साथ ही मृदा स्वास्थ्य, पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग और एकीकृत कृषि प्रणालियों पर भी ध्यान बढ़ा है।
यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत के सामने जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव, बदलता मौसम और कृषि योग्य भूमि के सीमित विस्तार जैसी चुनौतियां हैं। ऐसे में भविष्य की कृषि को संसाधन-कुशल और टिकाऊ बनाना आवश्यक है।
किसान सहायता व्यवस्था में विस्तार
किसानों की आर्थिक सुरक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने से सुनिश्चित नहीं होती। बीज, खाद, सिंचाई और मशीनरी जैसी कृषि लागत के साथ बाजार मूल्य, मौसम और प्राकृतिक जोखिम भी किसान की आय को प्रभावित करते हैं। इसलिए आधुनिक कृषि नीति में आय सहायता, संस्थागत ऋण, बीमा, खरीद व्यवस्था और बाजार तक पहुंच को एक साथ मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार की विभिन्न योजनाओं में किसानों के साथ-साथ FPOs, स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को भी शामिल किया गया है। इन पहलों का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में वित्तीय सहायता के साथ-साथ उद्यमिता, रोजगार और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देना है।
FPO मॉडल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। छोटे किसान सामूहिक रूप से खरीद, उत्पादन, भंडारण और विपणन करें तो उनकी सौदेबाजी क्षमता बढ़ सकती है। सामूहिक व्यवस्था से उत्पादन लागत कम करने और बाजार तक बेहतर पहुंच बनाने के अवसर भी पैदा होते हैं।
डिजिटल तकनीक से बदलता किसान
कृषि क्षेत्र में डिजिटल तकनीक का विस्तार भी नए युग की महत्वपूर्ण पहचान है। मौसम संबंधी जानकारी, बाजार भाव, फसल सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी डिजिटल माध्यमों से किसानों तक पहुंचाने की कोशिश बढ़ी है।
अब कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट इमेजिंग, ड्रोन और डेटा आधारित प्रणालियों के इस्तेमाल की संभावनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। हालिया चर्चाओं में AI को कृषि बाजार, लॉजिस्टिक्स, वित्तीय निर्णय और जोखिम प्रबंधन से जोड़ने पर जोर दिखाई देता है। (
हालांकि तकनीक का लाभ तभी व्यापक होगा जब छोटे किसानों तक भी उसकी पहुंच सुनिश्चित हो। स्थानीय भाषाओं में सरल डिजिटल सेवाएं, ग्रामीण इंटरनेट कनेक्टिविटी और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में लचीली कृषि
कृषि की सफलता अब केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं, बल्कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में उसकी मजबूती से भी तय होगी। अनियमित बारिश, तापमान में बदलाव, सूखा और अन्य मौसमी जोखिम किसानों की आय को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी कारण जलवायु-अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई और एकीकृत कृषि प्रणालियों को महत्व दिया जा रहा है। सरकार ने टिकाऊ और जलवायु-सक्षम कृषि को लेकर विभिन्न कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया है।
फसल के साथ पशुपालन, बागवानी और मत्स्यपालन को जोड़ना भी जोखिम कम करने की रणनीति बन सकता है। एक ही आय स्रोत पर निर्भरता कम होने से ग्रामीण परिवारों को आर्थिक झटकों से निपटने में मदद मिल सकती है।
खाद्य प्रसंस्करण से बढ़ेगा मूल्य
भारत लंबे समय से बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादन करता रहा है, लेकिन कृषि उत्पादों का अधिकतम आर्थिक मूल्य तभी प्राप्त होगा जब कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जाए और प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाई जाए।
कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, पैकेजिंग, परिवहन और खाद्य प्रसंस्करण की बेहतर व्यवस्था किसानों को बाजार से जोड़ सकती है। इससे टमाटर, फल, सब्जियां, दूध, मछली और अन्य उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने तथा बेहतर कीमत प्राप्त करने की संभावना बढ़ती है।
यही कारण है कि आधुनिक कृषि का लक्ष्य केवल खेत में उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि खेत से बाजार और बाजार से उपभोक्ता तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना बनता जा रहा है।
चुनौतियां अभी भी मौजूद
भारतीय कृषि में बदलाव स्पष्ट है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह चुनौती-मुक्त नहीं है। छोटे और बिखरे हुए खेत, सीमित मशीनीकरण, सिंचाई की असमान उपलब्धता, गुणवत्ता वाले कृषि इनपुट तक पहुंच, भंडारण की कमी और बाजार संबंधी समस्याएं अभी भी कई किसानों के सामने हैं। कृषि क्षेत्र की उत्पादकता और किसानों की वास्तविक आय बढ़ाने के लिए इन बाधाओं को लगातार दूर करना जरूरी है।
तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ भी तभी प्रभावी होगा जब उनका क्रियान्वयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हो। अलग-अलग राज्यों में मिट्टी, जलवायु, फसल और बाजार की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए कृषि नीति में स्थानीय जरूरतों और किसान की वास्तविक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व देना आवश्यक है।
भविष्य की दिशा
भारतीय कृषि का अगला चरण ‘उत्पादन बढ़ाओ’ से आगे बढ़कर ‘उत्पादन के साथ आय, मूल्य और स्थिरता बढ़ाओ’ पर केंद्रित हो सकता है। इसके लिए खेती को तकनीक, वित्त, बाजार, प्रसंस्करण और संबद्ध क्षेत्रों के साथ जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।
कृषि शिक्षा और अनुसंधान की भूमिका भी बढ़ेगी। कृषि क्षेत्र में नई पीढ़ी के वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्यमी नई तकनीकों को गांवों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कृषि शिक्षा के लिए हाल में डिजिटल माध्यम से छात्रवृत्ति और फेलोशिप वितरण जैसी पहलें भी सामने आई हैं।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। बढ़ती उत्पादकता, मजबूत किसान सहायता व्यवस्था, बेहतर सिंचाई, संस्थागत ऋण, बीमा, डिजिटल तकनीक, FPOs और संबद्ध क्षेत्रों का विस्तार इस परिवर्तन की प्रमुख विशेषताएं हैं। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों की GVA में वृद्धि और खाद्यान्न उत्पादन में मजबूती इस बदलाव की आर्थिक तस्वीर को सामने रखती है।
हालांकि भविष्य की सफलता केवल उत्पादन के रिकॉर्ड से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि छोटे और सीमांत किसानों की आय कितनी स्थिर होती है, खेती कितनी टिकाऊ बनती है और ग्रामीण परिवारों को कितने नए आर्थिक अवसर मिलते हैं।
यदि तकनीक, बाजार, अनुसंधान, जल प्रबंधन और किसान-केंद्रित नीतियों का प्रभावी समन्वय जारी रहता है, तो भारतीय कृषि आने वाले वर्षों में केवल देश की खाद्य सुरक्षा का आधार नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि, रोजगार और आर्थिक विकास का और अधिक मजबूत इंजन बन सकती है। यही बदलाव भारतीय कृषि को एक नए युग की ओर ले जाने की सबसे बड़ी संभावना है।
