
नई दिल्ली। महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि महिला आरक्षण विधेयक 2023 संसद से पारित हो चुका है और कांग्रेस ने भी इसका पूर्ण समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह है कि कानून पारित होने के करीब तीन साल बाद भी इसे लागू क्यों नहीं किया गया?
कांग्रेस का आरोप है कि महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए परिसीमन को अनिवार्य शर्त के रूप में जोड़ना अनावश्यक है। पार्टी का कहना है कि सरकार को वर्ष 2023 में पारित कानून को बिना किसी अतिरिक्त शर्त के लागू करना चाहिए। विपक्ष की यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और संसद तथा विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा लगातार जारी है।
2023 में संसद ने पारित किया था महिला आरक्षण कानून
महिलाओं को विधायिका में अधिक प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद में पारित किया गया था। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है।
यह कानून संविधान में संशोधन के माध्यम से महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। विधेयक को संसद के दोनों सदनों से व्यापक समर्थन मिला था। इसके बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी प्राप्त हुई और यह संवैधानिक कानून का हिस्सा बन गया।
हालांकि, कानून के प्रावधानों को तत्काल लागू नहीं किया गया। इसके क्रियान्वयन को आगामी परिसीमन प्रक्रिया और उससे संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ा गया है। यही मुद्दा अब राजनीतिक विवाद का प्रमुख कारण बन रहा है।
कांग्रेस का सवाल- कानून लागू करने में देरी क्यों?
कांग्रेस की ओर से केंद्र सरकार से सीधा सवाल पूछा गया है कि जब महिला आरक्षण कानून संसद में पारित हो चुका है और विपक्ष ने भी इसका समर्थन किया था, तो फिर इसके कार्यान्वयन में देरी क्यों की जा रही है?
विपक्ष का तर्क है कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का मुद्दा किसी एक दल का विषय नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसलिए कानून को जल्द लागू किया जाना चाहिए।
कांग्रेस का कहना है कि सरकार को महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को किसी अन्य प्रक्रिया से जोड़कर टालना नहीं चाहिए। पार्टी की मांग है कि 2023 में बनाए गए कानून को बिना शर्त लागू किया जाए।
परिसीमन से जोड़ने पर क्यों उठ रहे सवाल?
महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन को लेकर परिसीमन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार महिला आरक्षण के प्रभावी होने से पहले सीटों के परिसीमन की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही वजह है कि सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। सरकार का पक्ष यह रहा है कि संवैधानिक प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही महिला आरक्षण को लागू किया जाएगा।
दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि कानून को लागू करने के लिए अतिरिक्त इंतजार महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को और पीछे धकेल सकता है। कांग्रेस का तर्क है कि यदि संसद ने कानून को स्वीकार कर लिया है, तो सरकार को उसके क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट समयसीमा और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का बड़ा सवाल
भारत में महिलाओं की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा है, लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व लंबे समय से अपेक्षाकृत कम रहा है। महिला आरक्षण कानून इसी असमानता को कम करने के उद्देश्य से लाया गया था।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की संख्या बढ़ने से नीति निर्माण में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अधिक मजबूती मिलने की उम्मीद की जाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार, पोषण, सामाजिक कल्याण और स्थानीय विकास जैसे विषयों पर महिलाओं का अनुभव नीति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने भी राजनीतिक भागीदारी का एक बड़ा आधार तैयार किया है। पंचायतों और नगर निकायों में बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में सामने आई हैं। इसी अनुभव को राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति में विस्तार देने की मांग लंबे समय से होती रही है।
राजनीतिक दलों के लिए भी बड़ी चुनौती
महिला आरक्षण कानून का क्रियान्वयन राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण चुनौती होगा। यदि लोकसभा और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं, तो सभी राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक ढांचे और उम्मीदवार चयन की रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा।
महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के अलावा राजनीतिक दलों को महिलाओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने और उन्हें चुनावी राजनीति के लिए तैयार करने पर भी ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रशिक्षण, संसाधन, सुरक्षित राजनीतिक वातावरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी भी आवश्यक है।
कांग्रेस और सरकार के बीच बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण हो सकता है। कांग्रेस लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि कानून को लागू करने में देरी स्वीकार्य नहीं है। वहीं सरकार संवैधानिक प्रक्रिया और परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को आधार बनाकर आगे बढ़ने की बात करती रही है।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू संसदीय मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सरकार का पक्ष रखते हैं। ऐसे में कांग्रेस की ओर से उन्हें सीधे संबोधित करते हुए महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विपक्ष का संदेश स्पष्ट है कि महिला आरक्षण को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके वास्तविक क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
क्या बिना परिसीमन लागू हो सकता है कानून?
यह सवाल संवैधानिक और कानूनी दृष्टि से जटिल है। महिला आरक्षण कानून में इसके प्रभावी होने को परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इसलिए केवल राजनीतिक घोषणा से इसके मौजूदा प्रावधानों को तत्काल लागू करना संभव नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि इस बहस में कानून की मूल भावना और उसके संवैधानिक प्रावधान—दोनों को समझना जरूरी है। विपक्ष जहां जल्द से जल्द प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बात कर रहा है, वहीं सरकार के सामने संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की जिम्मेदारी है।
ऐसे में विवाद का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के स्तर पर तलाशना होगा।
महिला आरक्षण सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं
महिला आरक्षण को केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखना इसके व्यापक महत्व को सीमित कर देगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि समाज के विभिन्न वर्गों को निर्णय लेने वाली संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से लोकतांत्रिक संस्थाओं में विविधता बढ़ सकती है। इससे उन मुद्दों को भी प्राथमिकता मिल सकती है, जो लंबे समय से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में पर्याप्त स्थान नहीं पा सके हैं।
हालांकि, यह भी जरूरी है कि महिला प्रतिनिधियों को केवल आरक्षित सीटों तक सीमित राजनीतिक पहचान न मिले। उन्हें स्वतंत्र रूप से नीति बनाने, बहस में भाग लेने और अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए निर्णय लेने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण कानून 2023 भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहल है। संसद से पारित होने के बाद इसके क्रियान्वयन को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
कांग्रेस की मांग है कि कानून को बिना अनावश्यक शर्तों के लागू किया जाए और महिलाओं को संसद तथा विधानसभाओं में उनका निर्धारित प्रतिनिधित्व जल्द मिले। दूसरी ओर, इसके कार्यान्वयन से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था में परिसीमन की भूमिका महत्वपूर्ण है।
अब असली चुनौती यह है कि राजनीतिक दल इस विषय को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखें, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ऐसा रास्ता निकालें जिससे महिला आरक्षण का उद्देश्य जल्द से जल्द वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदल सके।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लोकतंत्र की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा विषय है। इसलिए 2023 में पारित कानून के क्रियान्वयन की समयसीमा, प्रक्रिया और रोडमैप को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच स्पष्ट संवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में होगा।
