मानसून पर संसद में सरकार का जवाब: 2026 में सामान्य से कम बारिश का अनुमान, अगस्त तक 12% बारिश की कमी

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2026 के मानसून की तस्वीर केवल देशव्यापी औसत बारिश से समझना पर्याप्त नहीं है। जून में 35% बारिश की कमी और जुलाई में राष्ट्रीय स्तर पर LPA से 1% अधिक वर्षा के बावजूद कई जिलों में कमी बनी रहना क्षेत्रीय असमानता को दर्शाता है। 2 अगस्त तक संचयी बारिश का LPA से 12% नीचे रहना यह बताता है कि आने वाले हफ्तों की बारिश महत्वपूर्ण होगी। इसलिए कृषि और जल प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर के वर्षा आंकड़े, जल उपलब्धता और आगे के IMD पूर्वानुमान पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

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नई दिल्ली। देश में 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून की स्थिति को लेकर संसद में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों और अब तक दर्ज बारिश के आंकड़ों के अनुसार, इस मानसून सीजन में देशभर में वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई थी। मानसून की शुरुआत से पहले जारी किए गए पूर्वानुमान में जहां पूरे सीजन के दौरान दीर्घकालिक औसत यानी Long Period Average (LPA) के मुकाबले कम बारिश का अनुमान लगाया गया था, वहीं मौसम के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा की स्थिति में काफी अंतर देखने को मिला।

संसद में उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, मौसम विभाग ने 13 अप्रैल 2026 को दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपना पहला दीर्घकालिक पूर्वानुमान जारी किया था। इसमें पूरे मानसून सीजन के दौरान बारिश LPA की 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। बाद में दूसरे चरण के पूर्वानुमान में इसे संशोधित कर 90 प्रतिशत LPA कर दिया गया।

अप्रैल में जारी हुआ था पहला मानसूनी अनुमान

भारत मौसम विज्ञान विभाग देश में मानसून की स्थिति को समझने और उसके संभावित प्रदर्शन का पूर्वानुमान जारी करने वाली प्रमुख मौसम एजेंसी है। 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए विभाग ने अपना पहला चरण का लंबी अवधि वाला पूर्वानुमान 13 अप्रैल को जारी किया था।

इस अनुमान में मानसून की कुल बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना व्यक्त की गई थी। मौसम विभाग ने इसे दीर्घकालिक औसत के 92 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान लगाया था।

बाद में मौसम की परिस्थितियों और उपलब्ध वैज्ञानिक संकेतकों के आधार पर दूसरे चरण का पूर्वानुमान जारी किया गया। इसमें बारिश के अनुमान को और घटाकर 90 प्रतिशत LPA कर दिया गया। साथ ही, मौसम विभाग ने एल नीनो (El Niño) जैसी परिस्थितियों के विकसित होने को लेकर भी चिंता जताई थी।

जून में बारिश की स्थिति रही कमजोर

मानसून के शुरुआती दौर में देश के कई हिस्सों में वर्षा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर रही। जून 2026 में देशभर में बारिश सामान्य स्तर से 35 प्रतिशत कम दर्ज की गई।

जून की बारिश में कमी का प्रभाव व्यापक रहा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देश के करीब 70 प्रतिशत जिलों में वर्षा की कमी दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि मानसून के शुरुआती महीने में बड़ी संख्या में क्षेत्रों को अपेक्षित मात्रा में बारिश नहीं मिली।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून के शुरुआती महीनों की बारिश विशेष महत्व रखती है। खेती, जल संसाधन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जलाशयों की स्थिति पर मानसूनी वर्षा का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

हालांकि केवल राष्ट्रीय स्तर का आंकड़ा पूरे देश की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाता। अलग-अलग राज्यों और जिलों में बारिश का वितरण काफी अलग हो सकता है।

जुलाई में राष्ट्रीय आंकड़ा सुधरा

जून के मुकाबले जुलाई में देश के कुल बारिश के आंकड़े में सुधार देखने को मिला। केंद्रीय भारत के कई हिस्सों में हुई भारी बारिश का असर राष्ट्रीय आंकड़ों पर पड़ा। इसके चलते जुलाई में देशभर में वर्षा LPA के मुकाबले 1 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई।

लेकिन जुलाई में सामान्य से अधिक राष्ट्रीय बारिश होने के बावजूद पूरे देश में वर्षा समान रूप से नहीं हुई। कई क्षेत्रों में बारिश की कमी बनी रही और भौगोलिक असमानता स्पष्ट दिखाई दी।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जुलाई के दौरान देश के करीब 47 प्रतिशत जिलों में बारिश की कमी या बड़ी कमी दर्ज की गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय औसत सामान्य होने के बावजूद कई इलाकों में मानसून की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी रही।

मानसून में क्षेत्रीय असमानता बड़ी चुनौती

भारत में मानसून की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसका व्यापक लेकिन असमान वितरण है। एक क्षेत्र में भारी बारिश हो सकती है, जबकि उसी समय दूसरे क्षेत्र में बारिश की कमी बनी रह सकती है।

2026 के मानसून में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। केंद्रीय भारत में भारी बारिश ने जुलाई के राष्ट्रीय आंकड़े को बेहतर किया, लेकिन अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम वर्षा की स्थिति बनी रही।

इस तरह के क्षेत्रीय अंतर का असर कृषि और जल उपलब्धता पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। जिन क्षेत्रों में लगातार बारिश कम रहती है, वहां सिंचाई और जल संरक्षण की आवश्यकता बढ़ सकती है। दूसरी ओर, बहुत अधिक बारिश वाले इलाकों में जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियों से निपटने की चुनौती सामने आ सकती है।

2 अगस्त तक 12 प्रतिशत बारिश की कमी

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 2 अगस्त 2026 तक देश में संचयी मानसूनी बारिश LPA से 12 प्रतिशत कम थी।

यह आंकड़ा मौसम विभाग के शुरुआती मौसमी अनुमान के काफी करीब है। यानी मानसून के दौरान अलग-अलग समय पर बारिश में उतार-चढ़ाव के बावजूद अब तक का संचयी प्रदर्शन शुरुआती अनुमान के अनुरूप दिखाई दे रहा है।

हालांकि मानसून में अंतर-मौसमी बदलाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। इसलिए किसी एक महीने या कुछ सप्ताह के आंकड़ों के आधार पर पूरे मानसून सीजन का अंतिम आकलन करना उचित नहीं होगा।

एल नीनो को लेकर भी थी चिंता

2026 के मानसून पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने एल नीनो परिस्थितियों के विकसित होने की संभावना को लेकर भी चिंता जताई थी।

एल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जिसका प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ सकता है। इसका असर हर बार एक जैसा नहीं होता, लेकिन भारतीय मानसून के संदर्भ में इसकी गतिविधियों पर मौसम वैज्ञानिकों की विशेष नजर रहती है।

इसीलिए मानसून के पूर्वानुमान तैयार करते समय समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों सहित कई वैज्ञानिक संकेतकों का अध्ययन किया जाता है।

LPA क्या है?

मानसून की बारिश को समझने के लिए LPA यानी Long Period Average एक महत्वपूर्ण पैमाना है। यह लंबी अवधि के दौरान दर्ज की गई वर्षा के औसत को दर्शाता है।

जब मौसम विभाग कहता है कि बारिश 90 प्रतिशत LPA रहने की संभावना है, तो इसका मतलब होता है कि अनुमानित वर्षा लंबी अवधि के औसत के लगभग 90 प्रतिशत के आसपास रह सकती है।

इसलिए 100 प्रतिशत LPA को सामान्य औसत के संदर्भ में देखा जाता है, जबकि इससे नीचे या ऊपर के आंकड़े सामान्य से कम या अधिक वर्षा की स्थिति को दर्शाते हैं।

किसानों और जल संसाधनों के लिए मानसून का महत्व

भारत की कृषि व्यवस्था में मानसून की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश के कई हिस्सों में खेती के लिए बारिश पर निर्भरता बनी हुई है। मानसून की मात्रा के साथ-साथ उसका समय और वितरण भी कृषि के लिए महत्वपूर्ण होता है।

यदि बारिश समय पर और पर्याप्त मात्रा में होती है तो फसलों की बुवाई और शुरुआती विकास के लिए परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं। वहीं लंबे समय तक बारिश की कमी रहने पर किसानों को सिंचाई के अतिरिक्त साधनों पर निर्भर होना पड़ सकता है।

मानसून का असर जलाशयों, नदियों, भूजल और पेयजल उपलब्धता पर भी पड़ता है। इसलिए वर्षा के आंकड़ों पर सरकार और प्रशासन की लगातार नजर रहती है।

केवल कुल बारिश का आंकड़ा पर्याप्त नहीं

2026 के मानसून के आंकड़े यह भी बताते हैं कि पूरे देश का औसत आंकड़ा अपने आप में पूरी तस्वीर नहीं देता। जुलाई में राष्ट्रीय स्तर पर बारिश LPA से 1 प्रतिशत अधिक रही, लेकिन लगभग आधे जिलों में बारिश की कमी या बड़ी कमी दर्ज की गई।

इससे स्पष्ट है कि मौसम की स्थिति का मूल्यांकन करते समय क्षेत्रीय और स्थानीय आंकड़ों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

किसी राज्य या जिले में सामान्य से कम बारिश का स्थानीय स्तर पर प्रभाव राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक महसूस किया जा सकता है।

आगे के महीनों पर रहेगी नजर

अगस्त और सितंबर मानसून के महत्वपूर्ण महीने होते हैं। इसलिए आने वाले समय में बारिश की मात्रा और वितरण पर नजर रखना जरूरी होगा। मौसम विभाग के पूर्वानुमान समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के आधार पर अपडेट किए जाते हैं।

विशेषज्ञों और प्रशासन के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बारिश की कमी वाले जिलों में स्थिति किस तरह बदलती है और क्या आने वाले समय में वर्षा का वितरण अधिक संतुलित होता है।

निष्कर्ष

2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून अब तक उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय असमानता वाला रहा है। मौसम विभाग ने अप्रैल में पूरे सीजन के लिए LPA की 92 प्रतिशत बारिश का अनुमान लगाया था, जिसे दूसरे चरण में संशोधित कर 90 प्रतिशत किया गया।

जून में देश में बारिश 35 प्रतिशत कम रही और करीब 70 प्रतिशत जिलों में वर्षा की कमी दर्ज की गई। जुलाई में केंद्रीय भारत की भारी बारिश के कारण राष्ट्रीय स्तर पर बारिश LPA से 1 प्रतिशत अधिक हुई, लेकिन करीब 47 प्रतिशत जिलों में कमी या बड़ी कमी बनी रही।

2 अगस्त 2026 तक संचयी मानसूनी बारिश LPA से 12 प्रतिशत कम थी। यह स्थिति शुरुआती मौसमी अनुमान के अनुरूप दिखाई देती है, हालांकि मानसून में आगे भी बदलाव संभव हैं।

कुल मिलाकर, 2026 के मानसून का आकलन केवल राष्ट्रीय औसत से नहीं बल्कि क्षेत्रीय वर्षा वितरण, कृषि पर प्रभाव, जल संसाधनों और आने वाले महीनों की मौसम गतिविधियों को ध्यान में रखकर करना अधिक उचित होगा।

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