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वाणिज्यिक कोयला खनन: आत्मनिर्भर भारत की ऊर्जा यात्रा को नई गति देने वाला महत्वपूर्ण कदम

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भूमिका

भारत तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है और इस विकास की सबसे बड़ी आवश्यकता है—ऊर्जा। उद्योगों, परिवहन, कृषि, शहरीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति अनिवार्य है। भारत की ऊर्जा व्यवस्था में आज भी कोयले की केंद्रीय भूमिका है। देश की प्राथमिक ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा कोयले से पूरा होता है, जबकि 70 प्रतिशत से अधिक बिजली उत्पादन कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से होता है।

ऐसे समय में जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, वाणिज्यिक कोयला खनन (Commercial Coal Mining) देश की ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है।


भारत की ऊर्जा व्यवस्था में कोयले का महत्व

भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और आधारभूत ढांचे के विस्तार के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कोयला सबसे भरोसेमंद और उपलब्ध ऊर्जा स्रोत बना हुआ है।

देश के अधिकांश ताप विद्युत संयंत्र कोयले पर आधारित हैं। इस कारण कोयले की स्थिर उपलब्धता न केवल बिजली उत्पादन बल्कि इस्पात, सीमेंट, एल्यूमीनियम और कई अन्य प्रमुख उद्योगों के लिए भी आवश्यक है।

यद्यपि भारत अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में कोयला ऊर्जा मिश्रण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।


विश्व के सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देशों में भारत

भारत के पास लगभग 400,715 मिलियन टन (एमटी) का विशाल कोयला भंडार है, जो उसे विश्व में पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार वाला देश बनाता है।

इतने बड़े संसाधन भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्रदान करते हैं। इन भंडारों का वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से संतुलित उपयोग देश की ऊर्जा सुरक्षा को लंबे समय तक मजबूत बना सकता है।


कोयला उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि

पिछले एक दशक में भारत ने कोयला उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।

वित्त वर्ष 2014-15 में जहां देश का कुल कोयला उत्पादन लगभग 609.18 मिलियन टन था, वहीं उत्पादन लगातार बढ़ते हुए—

तक पहुंच गया।

लगातार दो वर्षों तक एक अरब टन से अधिक उत्पादन भारत के खनन इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। इससे बिजली संयंत्रों को पर्याप्त ईंधन उपलब्ध कराने में सहायता मिली है और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रगति हुई है।


वाणिज्यिक कोयला खनन क्या है?

वाणिज्यिक कोयला खनन वह व्यवस्था है जिसमें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से कोयला खदानें आवंटित की जाती हैं और उन्हें बाजार में कोयला बेचने की अनुमति होती है।

पहले अधिकांश खदानें केवल निर्धारित उपयोग (कैप्टिव माइनिंग) के लिए आवंटित की जाती थीं, लेकिन नई व्यवस्था ने प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है।

इस नीति का उद्देश्य है—


कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों का बढ़ता योगदान

देश के कुल कोयला उत्पादन में कैप्टिव एवं वाणिज्यिक ब्लॉकों का योगदान लगातार बढ़ रहा है।

वित्त वर्ष 2021-22 में इनका राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान लगभग 10.9 प्रतिशत था।

यह बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 20.2 प्रतिशत तक पहुंच गया।

यह वृद्धि दर्शाती है कि नई खनन नीति धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम दे रही है। निजी निवेश और बेहतर प्रबंधन के कारण उत्पादन क्षमता में वृद्धि देखने को मिल रही है।


रोजगार और स्थानीय विकास को बढ़ावा

भारत में लगभग पांच लाख खनिक 350 से अधिक कोयला खदानों में कार्यरत हैं।

नई खदानों के विकास से केवल प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं बल्कि अनेक अप्रत्यक्ष रोजगार भी उत्पन्न होते हैं।

इनमें शामिल हैं—

खनन परियोजनाओं के आसपास सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं का भी विस्तार होता है, जिससे स्थानीय क्षेत्रों का सामाजिक और आर्थिक विकास तेज होता है।


आत्मनिर्भर भारत अभियान को मिलेगा बल

आत्मनिर्भर भारत का उद्देश्य घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना है।

भारत लंबे समय तक कोयले का आयात करता रहा है, विशेषकर कुछ विशेष प्रकार के कोयले का।

घरेलू उत्पादन में वृद्धि से—

वाणिज्यिक खनन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।


तकनीकी आधुनिकीकरण की आवश्यकता

कोयला उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग भी आवश्यक है।

आज खनन क्षेत्र में—

जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है।

इनसे उत्पादन क्षमता बढ़ती है, दुर्घटनाओं में कमी आती है और पर्यावरणीय निगरानी भी बेहतर होती है।


पर्यावरणीय संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण

कोयला विकास का महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण संरक्षण भी आवश्यक है।

इस दिशा में निम्नलिखित उपाय महत्वपूर्ण हैं—

भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार का भी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसलिए भविष्य की ऊर्जा नीति में कोयला और स्वच्छ ऊर्जा दोनों का संतुलित विकास आवश्यक रहेगा।


ऊर्जा सुरक्षा और विकसित भारत का लक्ष्य

भारत की अर्थव्यवस्था अगले वर्षों में और अधिक ऊर्जा की मांग करेगी।

यदि घरेलू कोयला उत्पादन लगातार बढ़ता है, तो—

ये सभी कारक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होंगे।


भविष्य की चुनौतियां

हालांकि प्रगति उल्लेखनीय है, फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं—

इन चुनौतियों का संतुलित समाधान ही दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करेगा।


निष्कर्ष

वाणिज्यिक कोयला खनन भारत की ऊर्जा नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। देश के विशाल कोयला भंडार, लगातार बढ़ते उत्पादन और कैप्टिव एवं वाणिज्यिक ब्लॉकों की बढ़ती भागीदारी से यह स्पष्ट होता है कि भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम उठा रहा है। पिछले एक दशक में कोयला उत्पादन में हुई उल्लेखनीय वृद्धि ने बिजली उत्पादन, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को नई गति दी है।

हालांकि ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में संतुलित प्रयास भी उतने ही आवश्यक हैं। यदि आधुनिक तकनीक, पारदर्शी नीतियों, सतत खनन और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ वाणिज्यिक कोयला खनन को आगे बढ़ाया जाता है, तो यह केवल ऊर्जा क्षेत्र को ही नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य को भी मजबूत आधार प्रदान करेगा।

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