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संसदीय प्रश्न: विकसित भारत के लिए परमाणु ऊर्जा मिशन—2047 तक 100 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य, मध्य पूर्व संघर्ष के बाद नई परियोजना को मंजूरी नहीं

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भूमिका

भारत ने ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और विकसित राष्ट्र बनने के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार ने “विकसित भारत परमाणु ऊर्जा मिशन” के तहत वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, कार्बन उत्सर्जन में कमी और औद्योगिक विकास को गति देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी है।

हाल ही में संसद में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सरकार ने स्पष्ट किया कि परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के निर्माण में सामान्यतः 10 से 12 वर्ष का समय लगता है। साथ ही यह भी बताया गया कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बाद किसी नई परमाणु ऊर्जा परियोजना को विशेष रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।

यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।


भारत के लिए परमाणु ऊर्जा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के बढ़ते प्रभाव के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।

कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर्यावरण पर दबाव बढ़ाता है, जबकि सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक ऐसा विकल्प है जो—

इन्हीं कारणों से सरकार ने परमाणु ऊर्जा को भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बनाया है।


2047 तक 100 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य

सरकार का उद्देश्य वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट तक पहुंचाना है।

यह लक्ष्य इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्तमान क्षमता की तुलना में यह कई गुना अधिक है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार विभिन्न राज्यों में नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने, आधुनिक तकनीकों को अपनाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी जैसे विकल्पों पर भी काम कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह लक्ष्य समय पर पूरा होता है तो भारत विश्व के प्रमुख परमाणु ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल हो सकता है।


परमाणु परियोजनाओं में क्यों लगता है 10–12 वर्ष का समय?

संसद में सरकार ने बताया कि किसी भी परमाणु ऊर्जा परियोजना के निर्माण में सामान्यतः 10 से 12 वर्ष लगते हैं।

इसके पीछे कई कारण हैं—

1. भूमि अधिग्रहण

सबसे पहले परियोजना के लिए उपयुक्त भूमि का चयन और अधिग्रहण किया जाता है।

2. पर्यावरणीय स्वीकृतियां

परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय सहित विभिन्न एजेंसियों से मंजूरी लेनी होती है।

3. सुरक्षा परीक्षण

परमाणु संयंत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है। प्रत्येक डिजाइन का विस्तृत परीक्षण होता है।

4. तकनीकी निर्माण

रिएक्टर, कंटेनमेंट सिस्टम, कूलिंग सिस्टम और अन्य जटिल संरचनाओं का निर्माण अत्यधिक समय लेने वाला कार्य होता है।

5. परीक्षण एवं कमीशनिंग

निर्माण पूरा होने के बाद संयंत्र का कई चरणों में परीक्षण किया जाता है, जिसके बाद ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है।


मध्य पूर्व संघर्ष और भारत की परमाणु नीति

संसद में दिए गए उत्तर के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बाद किसी नई परमाणु ऊर्जा परियोजना को विशेष मंजूरी नहीं दी गई है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम रोक दिया है। इसका आशय केवल इतना है कि संघर्ष के बाद कोई नई परियोजना विशेष रूप से स्वीकृत नहीं हुई।

हालांकि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां ऊर्जा क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।

इनमें शामिल हैं—

सरकार इन सभी पहलुओं की लगातार समीक्षा करती रहती है।


भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

भारत का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से तीन-चरणीय रणनीति पर आधारित है।

इसका उद्देश्य देश में उपलब्ध यूरेनियम और विशाल थोरियम भंडार का अधिकतम उपयोग करना है।

इस कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य हैं—

भारत इस दिशा में कई दशकों से अनुसंधान कर रहा है।


स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य में परमाणु ऊर्जा की भूमिका

भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं की हैं।

इनमें प्रमुख हैं—

परमाणु ऊर्जा इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन होता है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अपेक्षाकृत बहुत कम होता है।


परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियां

हालांकि परमाणु ऊर्जा के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं।

1. अत्यधिक लागत

परमाणु संयंत्रों की स्थापना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

2. लंबी निर्माण अवधि

10–12 वर्षों का समय परियोजना की लागत और वित्तीय जोखिम बढ़ा देता है।

3. सुरक्षा संबंधी चिंताएं

परमाणु संयंत्रों में उच्च स्तर की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक होती है।

4. रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन

परमाणु कचरे का सुरक्षित निस्तारण एक महत्वपूर्ण तकनीकी चुनौती है।

5. स्थानीय स्वीकृति

कई बार भूमि अधिग्रहण और स्थानीय लोगों की चिंताओं के कारण परियोजनाओं में देरी होती है।


भारत के लिए संभावित लाभ

यदि सरकार 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लेती है तो इसके अनेक लाभ हो सकते हैं—


भविष्य की दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना होगा—

इन कदमों से परियोजनाओं की गति तेज हो सकती है और लागत भी नियंत्रित की जा सकती है।


निष्कर्ष

भारत का 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी से स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं अत्यंत जटिल होती हैं और इनके निर्माण में 10 से 12 वर्ष का समय लगना सामान्य प्रक्रिया है। साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मध्य पूर्व संघर्ष के बाद किसी नई परमाणु ऊर्जा परियोजना को विशेष रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।

आने वाले वर्षों में यदि भारत योजनाबद्ध तरीके से नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाता है, आधुनिक तकनीक अपनाता है और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करता है, तो परमाणु ऊर्जा देश की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को गति देने और “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास—इन तीनों मोर्चों पर परमाणु ऊर्जा भारत के भविष्य की एक अहम आधारशिला बनकर उभर सकती है।

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