
भारत की कृषि परंपरा को फिर से प्राकृतिक और टिकाऊ दिशा देने के उद्देश्य से देशभर में चलाया जा रहा “खेत बचाओ अभियान” अब दक्षिण भारत में भी नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है। तमिलनाडु के विभिन्न जिलों में आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों ने किसानों के बीच प्राकृतिक खेती को लेकर नई उम्मीद जगाई है। अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करना और उन्हें ऐसी खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना है, जो मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य—तीनों की रक्षा कर सके।
इस अभियान के तहत तमिलनाडु के वदुगापट्टी, मुथुकुलथुर सहित कई क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण शिविर लगाए गए, जहां बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है। इसके साथ ही भोजन में बढ़ते रासायनिक अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। किसानों को यह भी समझाया गया कि यदि समय रहते प्राकृतिक खेती की ओर कदम नहीं बढ़ाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि और सुरक्षित खाद्य उत्पादन दोनों चुनौती बन सकते हैं।
अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसानों को केवल समस्याओं से परिचित कराना नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी उपलब्ध कराना है। प्रशिक्षण के दौरान प्राकृतिक खेती की प्रमुख तकनीकों जैसे बीजामृत, जीवामृत और नीमास्त्र की जानकारी दी गई। किसानों को इन जैविक तैयारियों को बनाने और खेतों में उपयोग करने की विधि सिखाई गई। विशेषज्ञों ने बताया कि बीजामृत बीजों को रोगों से बचाने में सहायक है, जीवामृत मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाकर उसकी उर्वरता को प्राकृतिक रूप से मजबूत करता है, जबकि नीमास्त्र रासायनिक कीटनाशकों का प्रभावी और सुरक्षित विकल्प है।
कार्यक्रमों के दौरान आधुनिक प्रस्तुतीकरण, प्रोजेक्टर और प्रदर्शनियों के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती के लाभों से अवगत कराया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उत्पादन लागत कम होती है, मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलती है। साथ ही किसानों को अधिक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद तैयार करने का अवसर मिलता है।
“खेत बचाओ अभियान” केवल एक जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की कृषि व्यवस्था को टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण जनआंदोलन बनता जा रहा है। तमिलनाडु में किसानों की बढ़ती भागीदारी इस बात का संकेत है कि देश का अन्नदाता अब रासायनिक खेती से आगे बढ़कर प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने वाली खेती की ओर लौट रहा है। यदि यह अभियान इसी गति से आगे बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल स्वस्थ खाद्यान्न उत्पादन में नई पहचान बनाएगा, बल्कि अपनी धरती, जल और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने में एक नई मिसाल कायम करेगा।
