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📰 मणिपुर में राष्ट्रपति शासन के छह महीने के विस्तार का प्रस्ताव: लोकसभा में अमित शाह का ऐलान


नई दिल्ली, 30 जुलाई 2025
देश के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में पिछले कुछ समय से व्याप्त जातीय तनाव, कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति और राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में राष्ट्रपति शासन को अगले छह महीने के लिए बढ़ाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यह विस्तार 13 अगस्त 2025 से 13 फरवरी 2026 तक लागू रहेगा।


🔎 पृष्ठभूमि:

मणिपुर में लंबे समय से कुकी और मैतेई समुदायों के बीच तनाव और टकराव की स्थिति बनी हुई है। फरवरी 2025 में स्थिति उस स्तर तक बिगड़ गई जब तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। तब से अब तक न तो विधानसभा चुनाव संभव हो पाए हैं और न ही कोई स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था बन सकी है।


🗣 अमित शाह का लोकसभा में संबोधन:

लोकसभा में गृह मंत्री ने कहा:

“राज्य की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह आवश्यक है कि मणिपुर में शांति और स्थायित्व स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति शासन को और छह महीने के लिए बढ़ाया जाए। हमारी सरकार राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है, लेकिन इसमें समय लगेगा।”

उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने मणिपुर के लिए विशेष राहत पैकेज, अर्धसैनिक बलों की तैनाती, और सांप्रदायिक संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।


🧩 विपक्ष की प्रतिक्रिया:

जहां एक ओर सरकार ने इसे आवश्यक प्रशासनिक निर्णय बताया, वहीं विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता ने कहा कि:

“लगातार राष्ट्रपति शासन लागू रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। केंद्र सरकार को जल्द से जल्द चुनाव कराने चाहिए और राज्य की जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देना चाहिए।”


📌 वर्तमान स्थिति:

मणिपुर में अभी भी कई इलाकों में कर्फ्यू, इंटरनेट प्रतिबंध और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती जारी है। आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं और बाजारों में गतिविधियां सीमित हैं।


🛠 भविष्य की रणनीति:

सरकार की ओर से बताया गया कि:


🔚 निष्कर्ष:

मणिपुर की स्थिति आज भी अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में राष्ट्रपति शासन का विस्तार, भले ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर प्रतीत हो, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से इसे एक अनिवार्य कदम बताया जा रहा है। यह देखना अब महत्वपूर्ण होगा कि अगले छह महीनों में राज्य में कितनी स्थिरता लौटती है और चुनाव कराने की स्थिति कब बनती है।


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