
भारत के सैन्य इतिहास में कारगिल युद्ध एक ऐसा अध्याय है, जिसने देश को साहस, बलिदान और अडिग संकल्प का अर्थ फिर से समझाया। वर्ष 1999 में लड़ा गया यह युद्ध केवल सीमाओं की रक्षा का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और आत्मसम्मान की रक्षा की निर्णायक लड़ाई थी।
पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ संघर्ष
1998-99 के दौर में भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक बातचीत की पहल हुई थी। उस समय भारत के प्रधानमंत्री ने लाहौर बस यात्रा कर शांति का संदेश दिया। लेकिन इसी दौरान पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों ने जम्मू-कश्मीर के कारगिल क्षेत्र की ऊंची पहाड़ियों पर गुप्त रूप से कब्ज़ा जमा लिया।
मई 1999 में जब स्थानीय चरवाहों और भारतीय सेना को इन घुसपैठियों की मौजूदगी का पता चला, तब स्थिति की गंभीरता सामने आई। दुश्मन ऊँची चोटियों पर बैठा था, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे घाटी से चढ़ाई करते हुए मोर्चा संभालना था।
ऑपरेशन विजय: प्रतिकार की रणनीति
घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। थल सेना के साथ-साथ वायुसेना ने भी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के तहत हवाई कार्रवाई की। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और बर्फीले मौसम के बावजूद भारतीय जवानों ने असाधारण साहस का परिचय दिया।
ड्रास, तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी रणनीतिक ऊँचाइयों पर भीषण लड़ाई लड़ी गई। कई जवानों ने जान की परवाह किए बिना तिरंगा फहराने का संकल्प पूरा किया। 26 जुलाई 1999 को भारत ने आधिकारिक रूप से युद्ध की सफलता की घोषणा की। यह दिन आज ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
वीरों का बलिदान
कारगिल युद्ध में सैकड़ों भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। कैप्टन विक्रम बत्रा, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव जैसे अनेक वीरों ने अदम्य साहस दिखाया और परम वीर चक्र से सम्मानित हुए। उनके प्रेरणादायक शब्द और कार्य आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और प्रभाव
कारगिल युद्ध ने वैश्विक स्तर पर यह स्पष्ट किया कि नियंत्रण रेखा का सम्मान अनिवार्य है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस संघर्ष में भारत की स्थिति को समझा। अंततः पाकिस्तान को अपने सैनिकों को पीछे हटाने पर मजबूर होना पड़ा।
इस युद्ध ने भारतीय सेना की तैयारी, खुफिया तंत्र और तकनीकी क्षमता को सशक्त करने की दिशा में कई सुधारों की नींव रखी। रक्षा क्षेत्र में आधुनिकीकरण को नई गति मिली।
निष्कर्ष
कारगिल युद्ध केवल सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि यह राष्ट्र की एकजुटता और सैनिकों के अदम्य साहस का प्रतीक है। बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर लड़ी गई यह लड़ाई हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए निरंतर सतर्कता और बलिदान आवश्यक है।
हर वर्ष जब 26 जुलाई आता है, तो पूरा देश उन वीरों को नमन करता है, जिन्होंने देश की आन-बान-शान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। कारगिल की ऊँचाइयों पर लहराता तिरंगा भारतीय संकल्प और शौर्य की अमर कहानी कहता रहेगा।