
भारतीय कृषि के क्षेत्र में यंत्रीकरण की दिशा में एक और अहम उपलब्धि सामने आई है। (ICAR) के अधीन भोपाल स्थित (CIAE) ने कपास उत्पादकों के लिए एक उन्नत मशीन विकसित की है—ब्रश-टाइप कॉटन स्ट्रिपर कम प्री-क्लीनर। यह मशीन विशेष रूप से हाई-डेन्सिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS) के तहत उगाई जाने वाली कपास की फसल के लिए तैयार की गई है, जिससे छोटे और मध्यम किसानों को सीधा लाभ मिल सके।
क्यों खास है यह मशीन?
1. किफायती और सुलभ तकनीक
जहां पारंपरिक स्पिंडल पिकर मशीन की कीमत लगभग 1 करोड़ रुपये तक पहुंचती है, वहीं यह नई मशीन मात्र 15 लाख रुपये में उपलब्ध है। कम लागत के कारण अधिक किसान इस तकनीक को अपनाने में सक्षम होंगे।
2. कम समय में अधिक कटाई
यह मशीन प्रति घंटे लगभग 0.23 हेक्टेयर क्षेत्र में कटाई करने में सक्षम है। इसके उपयोग से पारंपरिक हाथ से तुड़ाई की तुलना में लगभग 90 प्रतिशत समय की बचत होती है।
3. बेहतर गुणवत्ता वाली उपज
मशीन में लगा प्री-क्लीनर और प्न्यूमैटिक कन्वेयर सिस्टम कपास में मौजूद कचरे और अवांछित तत्वों को काफी हद तक अलग कर देता है, जिससे बाजार में बेहतर गुणवत्ता की फसल पहुंचती है।
4. भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल डिजाइन
दो पंक्तियों में कार्य करने वाला ट्रैक्टर-माउंटेड मॉडल भारतीय खेतों की संरचना को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। यह छोटे खेतों और विविध भूमि परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करता है।
किसानों को क्या होगा फायदा?
- कटाई लागत में कमी: प्रति किलो लगभग 5 रुपये तक की लागत बचत संभव है।
- श्रमिकों पर निर्भरता घटेगी: मजदूरों की कमी की स्थिति में भी समय पर कटाई हो सकेगी।
- उत्पादन और आय में वृद्धि: साफ़ और तेज़ कटाई से बाजार मूल्य बेहतर मिल सकता है।
- जोखिम में कमी: मौसम की अनिश्चितता के बीच जल्दी कटाई कर नुकसान कम किया जा सकता है।
व्यापक प्रभाव
भारत कपास उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। लेकिन बढ़ती मजदूरी लागत और श्रमिक संकट ने किसानों की चुनौतियाँ बढ़ाई हैं। ऐसे में यह तकनीक न केवल लागत घटाने में मदद करेगी बल्कि टिकाऊ और लाभकारी खेती को भी बढ़ावा देगी। यह कदम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और आधुनिक कृषि को गति प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
समापन
ICAR-CIAE भोपाल द्वारा विकसित यह नवाचार दर्शाता है कि भारतीय वैज्ञानिक संस्थान किसानों की वास्तविक जरूरतों को समझते हुए व्यावहारिक समाधान तैयार कर रहे हैं। यदि इस तकनीक का व्यापक स्तर पर प्रसार होता है, तो यह कपास उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।
सही मायनों में कहा जाए तो—
“तकनीक के संग बढ़ेगा किसान, समृद्ध होगा देश और खेत-खलिहान।”