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कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आज के दौर में मानव इतिहास के सबसे परिवर्तनकारी आविष्कारों में गिनी जा रही है। इसकी पहुँच अब प्रयोगशालाओं या तकनीकी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, न्याय प्रणाली, उद्योग, मीडिया और आम जनजीवन तक फैल चुकी है। एआई ने कार्यक्षमता और नवाचार की गति को बढ़ाया है, लेकिन इसके बढ़ते प्रभाव ने सुरक्षा, नैतिकता और समानता को लेकर वैश्विक स्तर पर गंभीर बहस भी छेड़ दी है।

की चेतावनी और प्रस्ताव

के महासचिव ने हाल ही में भारत में आयोजित AI Impact Summit 2026 के दौरान एआई शासन (AI Governance) पर महत्वपूर्ण चिंताएँ व्यक्त कीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि एआई का विकास कुछ प्रभावशाली कंपनियों या संपन्न देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि तकनीकी संसाधनों, निवेश और ज्ञान का समान वितरण नहीं हुआ, तो कई विकासशील राष्ट्र इस उभरते डिजिटल युग में पिछड़ सकते हैं।

उन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कोष स्थापित करने का विचार रखा, जिससे कम संसाधनों वाले देशों को एआई तकनीकों, प्रशिक्षण और बुनियादी ढाँचे तक समान अवसर मिल सके। उनका जोर इस बात पर था कि तकनीक का भविष्य समावेशी होना चाहिए, न कि केंद्रीकृत।

सुरक्षा, नैतिकता और मानवाधिकार

एआई के बढ़ते दायरे को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि स्पष्ट और विज्ञान-आधारित वैश्विक नियमों की आवश्यकता है। ऐसे सुरक्षा ढाँचे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि:

यदि एआई प्रणालियाँ बिना पारदर्शिता और निगरानी के कार्य करेंगी, तो जवाबदेही तय करना जटिल हो सकता है।

उभरती चुनौतियाँ

एआई के प्रसार के साथ कई जोखिम भी उभर रहे हैं:

समाधान की दिशा

एआई को सुरक्षित, संतुलित और सर्वसुलभ बनाने के लिए निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है:

निष्कर्ष

कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव सभ्यता के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। यह स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बना सकती है, शिक्षा को अधिक सुलभ कर सकती है और आर्थिक विकास को गति दे सकती है। परंतु इसके दुरुपयोग की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

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