
नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आज भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने स्वतंत्र भारत के प्रथम और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा (बस्ट) का अनावरण किया। यह प्रतिमा राष्ट्रपति भवन के भव्य ओपन स्टेयरकेस, अशोक मंडप के समीप स्थापित की गई है।
इस अवसर ने न केवल स्वतंत्रता के पश्चात भारत के प्रशासनिक इतिहास को पुनः स्मरण कराया, बल्कि औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़कर राष्ट्रीय आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करने का संदेश भी दिया।
औपनिवेशिक प्रतीक से भारतीय नेतृत्व तक
जहाँ पहले इस स्थान पर ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा स्थापित थी, वहीं अब उसे हटाकर राजगोपालाचारी जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह परिवर्तन केवल मूर्ति का स्थानांतरण नहीं, बल्कि सोच और प्रतीकों के परिवर्तन का संकेत है।
सरकार के अनुसार, यह पहल उन प्रयासों की श्रृंखला का हिस्सा है जिनके माध्यम से औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को पीछे छोड़ते हुए भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को सम्मान दिया जा रहा है।
राजाजी का ऐतिहासिक योगदान
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘राजाजी’ कहा जाता है, स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे एक प्रतिष्ठित विचारक, लेखक और प्रशासनिक क्षमता से युक्त राजनेता थे। वर्ष 1948 में वे स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल बने और 1950 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल ने नवस्वतंत्र राष्ट्र की प्रशासनिक स्थिरता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका व्यक्तित्व सादगी, सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण का उदाहरण था।
समारोह में विशिष्ट हस्तियों की उपस्थिति
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देश की कई प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित रहीं। इनमें उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, डॉ. एस. जयशंकर, धर्मेंद्र प्रधान, गजेंद्र सिंह शेखावत तथा एल. मुरुगन सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति और राजाजी के परिवारजन शामिल थे।
राष्ट्रीय स्मृति और वर्तमान संदर्भ
कार्यक्रम के उपरांत सामाजिक माध्यमों पर भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। अनेक लोगों ने इसे भारतीय अस्मिता के सम्मान के रूप में सराहा, वहीं कुछ ने यह प्रश्न भी उठाया कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को सम्मान देने के साथ-साथ वर्तमान चुनौतियों पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के कदम राष्ट्रीय स्मृति को आकार देते हैं। जब राष्ट्र अपने अतीत के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों को उचित स्थान देता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता है कि वे अपने इतिहास को जानें और उससे शक्ति प्राप्त करें।
आत्मगौरव की दिशा में प्रतीकात्मक पहल
राष्ट्रपति भवन में राजगोपालाचारी जी की प्रतिमा की स्थापना भारत की लोकतांत्रिक यात्रा और आत्मनिर्भर सोच के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह कदम इस बात का संकेत है कि भारत अब अपने इतिहास और मूल्यों को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ रहा है।
इस समारोह ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राज्य की सर्वोच्च संस्थाओं में भी उनका सम्मान सुनिश्चित किया जा रहा है।