
हाल के समय में “भाजपा हटाओ, सनातन बचाओ” जैसे नारे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। यह नारा उन समूहों और व्यक्तियों द्वारा उठाया जा रहा है जो मानते हैं कि वर्तमान सत्ता और सनातन परंपरा के मूल सिद्धांतों के बीच दूरी बढ़ रही है। इस मुद्दे पर देशभर में बहस तेज़ हुई है और अलग-अलग मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
संत समाज और राजनीतिक विवाद
कुछ संतों एवं धार्मिक नेताओं की ओर से सरकार की नीतियों या कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। उनका आरोप है कि आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने की कोशिश होती है और असहमति रखने वालों पर विभिन्न प्रकार के दबाव बनाए जाते हैं। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि क़ानून और प्रशासन अपनी प्रक्रिया के तहत काम करते हैं तथा किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
इस बहस का केंद्र यह है कि क्या धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक सत्ता के बीच संतुलन बना हुआ है या नहीं। कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धर्म और राजनीति के संबंध हमेशा संवेदनशील रहे हैं, इसलिए हर आरोप और प्रत्यारोप को तथ्यों और जांच की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप
विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि सत्ता का इस्तेमाल निजी या राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है। वे इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार करार देता है और अपने विकास कार्यों, योजनाओं और नीतियों का हवाला देकर खुद को जवाबदेह बताता है।
लोकतंत्र में असहमति का स्थान
भारत का लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहस की परंपरा पर आधारित है। किसी भी सरकार की आलोचना करना और नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है, बशर्ते वह शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में हो।
विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्थाओं और राजनीतिक विचारों को टकराव की बजाय संवाद के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि समाज में विभाजन की स्थिति न बने।
आगे की राह
देश में बढ़ती राजनीतिक ध्रुवीकरण की स्थिति के बीच यह आवश्यक है कि सभी पक्ष संयम बरतें। संत समाज, राजनीतिक दल और नागरिक समाज—सभी को मिलकर पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अंततः, लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। किसी भी मुद्दे पर अंतिम निर्णय जनता अपने मताधिकार के माध्यम से देती है। इसलिए आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तथ्यों, नीतियों और जनहित के आधार पर संवाद करना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का मार्ग है।