
अनूप सिंह [ रिपोर्टर चित्रकूट ]
उत्तर प्रदेश के हिस्से में स्थित तुलसी जल प्रपात, जिसे पहले “मारकुंडी के शबरी जल प्रपात” के नाम से जाना जाता था, अब गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है। यहां बने प्रदेश के पहले ग्लास ब्रिज की पहली बारिश में ही दरारें आ गई हैं, जिससे यह पर्यटकों के लिए बंद हो गया है। इस घटना ने निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
ब्रिज की स्थिति और समस्याएं
ग्लास ब्रिज का निर्माण वन विभाग द्वारा 3.70 करोड़ की लागत से किया गया था। इसे प्रदेश के पहले ग्लास ब्रिज का गौरव प्राप्त था, लेकिन निर्माण स्थल की तकनीकी गलतियों ने इसे विवादों में डाल दिया है। जहां ब्रिज का निर्माण किया गया है, वहां के चबूतरों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं, जिससे ब्रिज गिरने और जन हानि की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
ब्रिज के निर्माण में पवनसुत कांस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने काम किया था। जबकि इसे प्रपात के सौंदर्य स्थल पर पिलर देकर बनाना था, इसे उपयुक्त स्थल से दूर बनाया गया, जिससे इसकी संरचना कमजोर हो गई। इसके अलावा, टिकट विंडो और आसपास के सौंदर्यीकरण में भी उचित ध्यान नहीं दिया गया है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
इस खतरनाक स्थिति के मद्देनजर, जिलाधिकारी ने ब्रिज के प्रवेश द्वार को सील कर दिया है और जांच के आदेश दिए हैं। हालाँकि, कार्यदायी संस्था द्वारा इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, जिससे स्थिति और भी चिंताजनक बन गई है।
स्थानीय समुदाय की चिंता
जल प्रपात के अन्वेषक और अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के संस्थापक इस स्थिति से व्यथित हैं। उनका कहना है कि यदि प्राकृतिक सौंदर्यता को इस तरह से नुकसान पहुंचाया गया, तो यह पर्यटकों के आकर्षण को प्रभावित करेगा। “प्राकृतिक सौंदर्यता की निर्दयता का रूप यदि मिला तो इसे देखने आने वाले लोग मायूसी के साथ लौटेंगे,” वे कहते हैं।
निष्कर्ष
तुलसी जल प्रपात का यह मामला प्रदेश की प्रशासनिक और निर्माण प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जब तक ब्रिज की सुरक्षा और गुणवत्ता की जांच नहीं की जाती, तब तक यह न केवल पर्यटकों के लिए बल्कि स्थानीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय बना रहेगा। अगर शीघ्रता से उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह जल प्रपात अपनी प्राकृतिक सुंदरता खो सकता है और स्थानीय लोगों के लिए एक नकारात्मक अनुभव बन जाएगा।