
नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026 – दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए व्यवसायी भूपेश अरोड़ा को नियमित जमानत प्रदान की है। यह मामला प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत दर्ज किया गया था और कथित तौर पर “LOXAM” नामक ऑनलाइन निवेश ऐप से जुड़े 311 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित है।
प्रकरण की रूपरेखा
जांच एजेंसियों के अनुसार, “LOXAM” नाम का डिजिटल निवेश प्लेटफॉर्म निवेशकों को आकर्षक और त्वरित रिटर्न का भरोसा देकर धन एकत्र कर रहा था। आरोप है कि एकत्रित राशि को कई परतों में बांटकर वर्चुअल खातों, तथाकथित ‘म्यूल अकाउंट्स’ और हवाला तंत्र के जरिये विदेशों में स्थानांतरित किया गया।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपनी जांच में दावा किया कि भूपेश अरोड़ा इस कथित नेटवर्क के प्रमुख सूत्रधारों में शामिल था। एजेंसी का कहना था कि धन को शेल कंपनियों और विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़े माध्यमों से परिवर्तित कर देश से बाहर भेजा गया।
अदालत की टिप्पणियां और तर्क
इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष वित्तीय साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो कि आरोपी सीधे तौर पर कथित अपराध की आय से जुड़ा हो।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सह-आरोपियों के बयान, यदि वे विरोधाभासी या असंगत हों, तो अकेले उनके आधार पर जमानत से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।
महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने नोट किया कि अरोड़ा का नाम मूल (प्रेडिकेट) अपराध में दर्ज नहीं था और उसके खिलाफ आरोपपत्र भी दायर नहीं किया गया था। अदालत ने संविधान प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्राथमिक मानते हुए कहा कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के किसी व्यक्ति को लंबी अवधि तक हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है।
बचाव पक्ष का पक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा और उनकी टीम ने दलील दी कि आरोपी ने जांच में पूर्ण सहयोग किया है और उसके फरार होने की आशंका नहीं है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क रखा कि गवाहों के बयान समय के साथ बदलते रहे हैं और प्रारंभिक चरण में किसी ने भी सीधे तौर पर अरोड़ा की संलिप्तता का उल्लेख नहीं किया था।
निर्णय का व्यापक महत्व
यह आदेश कई मायनों में उल्लेखनीय माना जा रहा है।
- आर्थिक अपराधों से जुड़े कठोर कानूनों के बावजूद न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा।
- केवल आरोपों या सह-आरोपियों के कथनों के आधार पर लंबे समय तक कारावास को उचित ठहराने से न्यायालय ने परहेज किया।
- अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि जांच एजेंसियों को ठोस वित्तीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे; मात्र संदेह के आधार पर जमानत रोकी नहीं जा सकती।
निष्कर्ष
भूपेश अरोड़ा को मिली जमानत उनके लिए बड़ी राहत है, साथ ही यह आदेश न्यायिक संतुलन का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है—जहां एक ओर आर्थिक अपराधों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जाता, वहीं दूसरी ओर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा को भी उतना ही महत्व दिया जाता है।
यह फैसला भविष्य में समान प्रकृति के मामलों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु साबित हो सकता है।