
24 फरवरी 2026 को की राजधानी भोपाल राजनीतिक और किसान आंदोलनों का केंद्र बन गई, जब ने यहां एक विशाल “किसान महा चौपाल” का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता ने किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया।
इस महा चौपाल का मूल उद्देश्य भारत-अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना और किसानों के हितों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाना था।
राहुल गांधी का केंद्र सरकार पर प्रहार
सभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की व्यापार नीतियां देश के किसानों और वस्त्र उद्योग के हितों के विपरीत हैं।
राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख की पुस्तक का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे भी उठाए। उनका कहना था कि सीमाई चुनौतियों और आर्थिक नीतियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन वर्तमान नीतियों में यह संतुलन दिखाई नहीं देता।
उन्होंने किसानों की आय, फसल की कीमत और आयात-निर्यात नीतियों को जोड़ते हुए सवाल किया कि क्या वैश्विक समझौतों में ग्रामीण भारत की आवाज़ को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है।
किसानों की उपस्थिति और भावनाएं
भोपाल के जवाहर चौक पर आयोजित इस सभा में प्रदेश के कई जिलों से किसान पहुंचे। प्रतिभागियों ने आशंका जताई कि यदि सस्ते कृषि उत्पादों का आयात बढ़ा, तो स्थानीय किसानों की आमदनी प्रभावित हो सकती है।
कई किसानों ने मंच के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्हें ऐसी नीतियां चाहिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य, बाजार तक पहुंच और फसल सुरक्षा को मजबूत करें। चौपाल का माहौल संवाद और विरोध—दोनों का संगम बना रहा।
राजनीतिक संदेश और रणनीति
यह आयोजन केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कांग्रेस की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी किसानों के मुद्दों को केंद्र में रखकर जनसमर्थन मजबूत करना चाहती है।
कांग्रेस ने इस मंच से यह संदेश देने की कोशिश की कि वह किसानों के हितों के साथ खड़ी है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में पारदर्शिता तथा व्यापक चर्चा की मांग करती है।
निष्कर्ष
भोपाल में आयोजित किसान महा चौपाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि कृषि, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहेंगे। इस कार्यक्रम ने किसानों की चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर नई दिशा दी और यह संकेत दिया कि ग्रामीण भारत की आवाज़ अब नीति निर्माण की बहस में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।