नई दिल्ली, 10 मार्च 2026:
प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित साझा किया है, जिसमें पृथ्वी को राष्ट्र की ऊर्जा, समृद्धि और शक्ति का मूल स्रोत बताया गया है। यह सुभाषित भारतीय चिंतन परंपरा में पृथ्वी के महत्व और उसके प्रति कृतज्ञता की भावना को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर यह सुभाषित साझा करते हुए लिखा—
“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।
यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।
सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”
इस सुभाषित का भावार्थ यह है कि पृथ्वी महासागरों से घिरी हुई है और जल से परिपूर्ण है। ज्ञानी और विद्वान अपने ज्ञान के माध्यम से इसके रहस्यों को समझने का प्रयास करते रहे हैं। पृथ्वी का हृदय अनंत आकाश में स्थित उस शाश्वत सत्य से जुड़ा है, जो जीवन का अमृत माना जाता है। ऐसी पवित्र धरती ही हमारे राष्ट्र को शक्ति, ऊर्जा और समृद्धि प्रदान करती है।
भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को केवल प्राकृतिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति के रूप में देखा गया है। यह सुभाषित इसी भाव को व्यक्त करता है कि राष्ट्र की उन्नति और स्थिरता का आधार हमारी धरती और प्रकृति से जुड़ा हुआ है।
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह संदेश प्रकृति के प्रति सम्मान, संरक्षण और राष्ट्रनिर्माण के बीच गहरे संबंध को भी रेखांकित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि धरती की समृद्धि और संतुलन बनाए रखना ही भविष्य की शक्ति और प्रगति का आधार है।