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संसद में बोलने की स्वतंत्रता नियमों के अधीन: लोकसभा अध्यक्ष


ने स्पष्ट किया है कि संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है, बल्कि यह संविधान और सदन की कार्यवाही से जुड़े नियमों के दायरे में रहती है। उन्होंने कहा कि किसी भी सांसद को निर्धारित संसदीय नियमों से बाहर जाकर बोलने का विशेष अधिकार नहीं है।

नियमों के तहत संचालित होती है संसद

लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसद की कार्यवाही संविधान के प्रावधानों और सदन द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार चलती है। उन्होंने विशेष रूप से का उल्लेख करते हुए बताया कि संसद में वाक्-स्वातंत्र्य को भी संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के भीतर ही लागू किया गया है।

उन्होंने कहा कि कुछ सदस्यों के बीच यह धारणा बन गई है कि प्रतिपक्ष का नेता किसी भी समय खड़े होकर अपनी इच्छा के विषय पर बोल सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि सदन के नियम सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं।

माइक्रोफोन नियंत्रण को लेकर स्पष्टीकरण

सदन में यह आरोप भी लगाए गए कि पीठासीन अधिकारी विपक्षी सदस्यों के माइक्रोफोन बंद कर देते हैं। इस पर अध्यक्ष ने साफ किया कि अध्यक्ष की कुर्सी के पास माइक्रोफोन को ऑन या ऑफ करने का कोई बटन नहीं होता। सदन में तकनीकी व्यवस्था ऐसी है कि जिस सदस्य को बोलने की अनुमति दी जाती है, केवल उसी का माइक्रोफोन सक्रिय रहता है।

संसद की गरिमा बनाए रखने की अपील

लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में नारेबाजी, तख्तियां दिखाने, कागज़ फाड़ने या वेल में आकर विरोध करने जैसी गतिविधियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यवहार से न केवल संसद की कार्यवाही प्रभावित होती है बल्कि उसकी गरिमा और प्रतिष्ठा भी कम होती है।

उन्होंने याद दिलाया कि 1997 और 2001 में आयोजित पीठासीन अधिकारियों और संसदीय नेताओं के सम्मेलनों में भी सर्वसम्मति से यह माना गया था कि इस प्रकार के व्यवधान लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्य को नुकसान पहुंचाते हैं।

असहमति और अव्यवस्था में अंतर

अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में तीखी बहस और मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन स्वस्थ लोकतांत्रिक चर्चा और अव्यवस्था के बीच एक स्पष्ट सीमा होती है। संसद को विचार-विमर्श का गंभीर मंच बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है।

सभी सदस्यों को अवसर देने का प्रयास

ने बताया कि उन्होंने हमेशा यह प्रयास किया है कि सभी दलों के सांसदों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले। कई मौकों पर बहस और शून्यकाल का समय भी बढ़ाया गया ताकि अधिक सदस्य अपनी राय व्यक्त कर सकें।

उन्होंने यह भी कहा कि छोटे दलों, एक-सदस्यीय पार्टियों और निर्दलीय सांसदों को भी चर्चा में भागीदारी का मौका देने का विशेष प्रयास किया गया है।

महिला सांसदों के प्रति सम्मान

अध्यक्ष ने महिला सांसदों के प्रति सम्मान को दोहराते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि प्रत्येक महिला सदस्य को सदन में बोलने का अवसर मिले। उन्होंने कहा कि उनके मन में सभी महिला सदस्यों के प्रति सर्वोच्च सम्मान का भाव है।

संसद की प्रतिष्ठा बनाए रखने का आह्वान

अध्यक्ष ने कहा कि संसद देश के लगभग 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं और जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए इसकी गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि संसदीय संस्थाओं की प्रतिष्ठा कम होती है, तो इसका नुकसान पूरे राष्ट्र को होता है।

सकारात्मक माहौल में आगे बढ़ने की अपील

अपने संबोधन के अंत में अध्यक्ष ने सभी दलों से आग्रह किया कि वे आपसी मतभेदों को पीछे छोड़कर संसद को मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर आवाज का सम्मान होना चाहिए और सभी को राष्ट्रहित में सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।


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