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दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला: विदेशी छात्र की याचिका खारिज, वीज़ा विस्तार और मुआवज़े की मांग अस्वीकार

ने 13 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में नाइजीरियाई छात्र ओबिन्ना थियोडोर ओन्येनेटो द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने कहा कि किसी विदेशी नागरिक को वीज़ा विस्तार का अधिकार नहीं है और निजी विश्वविद्यालय के साथ शुल्क या प्रवेश से जुड़े विवादों को रिट याचिका के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ओबिन्ना थियोडोर ओन्येनेटो नाइजीरिया के नागरिक हैं। उन्हें 2015 में हरियाणा स्थित में बीटेक (कंप्यूटर साइंस) कार्यक्रम में प्रवेश मिला था। इसके आधार पर उन्होंने भारत का छात्र वीज़ा प्राप्त किया और पढ़ाई शुरू की।

बाद में उनके पिता के निधन के कारण आर्थिक समस्या उत्पन्न हो गई, जिसके चलते वे अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख सके। इसके बाद उन्हें में बीएससी-आईटी कोर्स में अस्थायी प्रवेश दिया गया।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि विश्वविद्यालय ने उनसे शुल्क लेने के बाद भी उन्हें नियमित प्रवेश नहीं दिया, आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराईं और पढ़ाई पूरी करने में बाधा उत्पन्न की। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ने उन्हें वीज़ा विस्तार के लिए आवश्यक बोनाफाइड प्रमाणपत्र जारी नहीं किया।

याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें

याचिका में अदालत से निम्नलिखित प्रमुख राहतें मांगी गई थीं—

सरकार और विश्वविद्यालय का पक्ष

सरकार की ओर से कहा गया कि छात्र का वीज़ा 31 जुलाई 2022 को समाप्त हो गया था। उसके बाद उसने आवश्यक बोनाफाइड प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया, इसलिए वीज़ा बढ़ाया नहीं जा सकता।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि के तहत केंद्र सरकार को विदेशी नागरिकों के प्रवेश और निष्कासन का पूर्ण अधिकार है।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय ने कहा कि छात्र ने कोर्स के लिए आवश्यक उपस्थिति और क्रेडिट पूरे नहीं किए। उसके पास कुल 138 क्रेडिट में से केवल 20 क्रेडिट ही थे, इसलिए डिग्री पूरी करना संभव नहीं था।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

1. निजी विश्वविद्यालय के खिलाफ रिट की सीमाएँ
अदालत ने कहा कि भले ही शिक्षा संस्थान सार्वजनिक कार्य करते हों, लेकिन फीस, प्रवेश या व्यक्तिगत अनुबंध से जुड़े विवाद निजी प्रकृति के होते हैं। ऐसे मामलों में रिट याचिका के बजाय सिविल अदालत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।

2. वीज़ा विस्तार का अधिकार नहीं
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी विदेशी नागरिक को भारत में रहने या वीज़ा विस्तार का अधिकार नहीं है। यह पूरी तरह सरकार के विवेकाधिकार का विषय है।

3. शिक्षा पूरी करने में छात्र की विफलता
रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि छात्र ने कई अवसर मिलने के बावजूद परीक्षा में भाग नहीं लिया और आवश्यक क्रेडिट भी अर्जित नहीं किए। इसलिए विश्वविद्यालय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत का निर्णय

इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी। साथ ही छात्र द्वारा दायर अवमानना याचिका भी अस्वीकार कर दी गई।

महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत

इस निर्णय में अदालत ने दो महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराए—

  1. निजी संस्थानों के साथ व्यक्तिगत विवाद सामान्यतः रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आते।
  2. विदेशी नागरिकों को भारत में रहने का अधिकार केवल वैध वीज़ा के आधार पर ही मिलता है; वीज़ा समाप्त होने के बाद सरकार उन्हें निर्वासित कर सकती है।

निष्कर्ष

इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि विदेशी छात्रों को भारत में पढ़ाई के दौरान वीज़ा नियमों और विश्वविद्यालय के शैक्षणिक मानकों का पालन करना अनिवार्य है। साथ ही, निजी विश्वविद्यालयों के साथ फीस या प्रवेश से जुड़े विवादों के लिए उचित मंच सिविल अदालतें हैं, न कि संवैधानिक रिट याचिकाएँ।

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