
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक 18 वर्षीय छात्र की हत्या ने एक बार फिर वहां की सुरक्षा व्यवस्था और मानवाधिकार स्थिति को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। पंजगुर जिले में रहने वाले युवक ज़मीर डागरज़ई की मौत को स्थानीय संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जबरन गुमशुदगी और संदिग्ध हत्या की घटनाओं से जोड़कर देखा है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब बलूचिस्तान में लोगों के लापता होने और बाद में मृत पाए जाने की घटनाओं को लेकर पहले से ही चिंता जताई जा रही है।
घटना कैसे हुई
मिली जानकारी के अनुसार, पंजगुर के सरदो इलाके के रहने वाले 18 वर्षीय ज़मीर डागरज़ई को 3 मार्च 2026 को चितकान क्षेत्र के टरफीस इलाके से कथित तौर पर उठा लिया गया था। परिवार और स्थानीय लोगों का कहना है कि उस दिन के बाद से वह अचानक लापता हो गया था और कई दिनों तक उसका कोई सुराग नहीं मिला।
करीब आठ दिन बाद 11 मार्च को पंजगुर के वाशाप क्षेत्र से एक शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान बाद में ज़मीर डागरज़ई के रूप में की गई। इस घटना के सामने आने के बाद स्थानीय संगठनों और कार्यकर्ताओं ने इसे एक गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बताया है।
स्थानीय संगठनों के आरोप
बलोच अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। बलोच यकजती कमेटी (BYC) से जुड़ी कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में सक्रिय तथाकथित “डेथ स्क्वाड्स” द्वारा कई युवाओं को उठाए जाने और बाद में उनकी हत्या किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
उनके अनुसार, पिछले कुछ महीनों में पंजगुर और केच जिलों में कई लोगों की इसी तरह संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई है। इसी तरह बलोच वॉयस फॉर जस्टिस नामक समूह ने भी चेतावनी दी है कि जिन परिवारों के सदस्य पहले से लापता हैं, उनके अन्य रिश्तेदार भी खतरे में हो सकते हैं।
बलोच राजनीतिक संगठन के नेता ने इस घटना को क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे दमन का उदाहरण बताते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं कई परिवारों को पीढ़ियों तक प्रभावित कर रही हैं।
परिवार का दर्दनाक इतिहास
ज़मीर डागरज़ई का परिवार पहले भी ऐसी त्रासदी का सामना कर चुका है। जानकारी के अनुसार, उसके पिता नासिर डागरज़ई को वर्ष 2011 में जबरन गायब कर दिए जाने का आरोप लगाया गया था। परिवार का दावा है कि उन्हें पहले गोली मारकर घायल किया गया और बाद में फिर से उठा लिया गया, जिसके बाद कथित तौर पर एक मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई।
परिवार के लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे परिवार को लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।
सुरक्षा नीति पर उठ रहे प्रश्न
ज़मीर डागरज़ई की मौत के बाद पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो क्षेत्र में लोगों का विश्वास और भी कमजोर हो सकता है।
हालांकि इस घटना को लेकर पाकिस्तान के आधिकारिक तंत्र की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है।
निष्कर्ष
पंजगुर में हुई यह घटना केवल एक छात्र की मौत का मामला नहीं है, बल्कि यह बलूचिस्तान में लंबे समय से चल रहे मानवाधिकार विवादों की गंभीरता को भी उजागर करती है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि जब तक ऐसी घटनाओं की पारदर्शी जांच नहीं होगी और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा, तब तक क्षेत्र में असंतोष और असुरक्षा की भावना बनी रहेगी।
ज़मीर डागरज़ई की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान में आम नागरिकों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं या नहीं।