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भारत सरकार द्वारा लकड़ी, पत्थर और धातु से बनी मूर्तियों पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) को 12% से घटाकर 5% करने का निर्णय एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम है। यह न केवल इन पारंपरिक उत्पादों को आम जनता के लिए अधिक सुलभ और किफायती बनाता है, बल्कि देश के लाखों कारीगरों और शिल्पकारों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखता है।

भारत में मूर्ति निर्माण की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। यहां के कारीगर अपनी कला और कौशल के माध्यम से लकड़ी, पत्थर और धातु में अद्भुत कृतियां तैयार करते हैं, जो न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होती हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और विरासत को भी जीवंत बनाए रखती हैं। लेकिन लंबे समय से उच्च कर दरों के कारण इन उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती थीं, जिससे उनकी मांग सीमित हो जाती थी।

GST दर में कमी आने से इन मूर्तियों की लागत में सीधे तौर पर कमी आएगी। इसका सबसे बड़ा लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा, क्योंकि अब वे कम कीमत में इन कलात्मक और धार्मिक वस्तुओं को खरीद सकेंगे। इसके साथ ही, बाजार में इनकी मांग बढ़ने की संभावना भी काफी अधिक है। जब मांग बढ़ेगी, तो उत्पादन भी बढ़ेगा, जिससे कारीगरों को अधिक काम और बेहतर आय प्राप्त होगी।

यह निर्णय विशेष रूप से ग्रामीण और छोटे शहरों में रहने वाले शिल्पकारों के लिए राहत लेकर आया है। भारत के कई हिस्सों में मूर्ति निर्माण एक पारंपरिक व्यवसाय है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। लेकिन आर्थिक दबाव और सीमित मांग के कारण कई कारीगर इस पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो रहे थे। अब GST में कटौती से उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी और उन्हें अपने हुनर को आगे बढ़ाने का नया अवसर मिलेगा।

इसके अलावा, यह कदम “वोकल फॉर लोकल” और “मेक इन इंडिया” जैसी पहलों को भी मजबूती देता है। जब देश में बने उत्पाद सस्ते और प्रतिस्पर्धी होंगे, तो लोग आयातित वस्तुओं के बजाय स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देंगे। इससे न केवल स्थानीय उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी।

पर्यटन क्षेत्र पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। भारत आने वाले पर्यटक अक्सर यहां की पारंपरिक कलाकृतियों और मूर्तियों को स्मृति चिन्ह के रूप में खरीदते हैं। कीमत कम होने से ये उत्पाद उनके लिए और आकर्षक बनेंगे, जिससे बिक्री में वृद्धि होगी।

अंततः, लकड़ी, पत्थर और धातु की मूर्तियों पर GST को 12% से घटाकर 5% करना एक दूरदर्शी निर्णय है। यह न केवल कारीगरों की आजीविका को सशक्त बनाता है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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