
एक अहम आदेश जारी करते हुए और वरिष्ठ अधिवक्ता के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला द्वारा लगाए गए कथित हमले के आरोपों से जुड़ा हुआ है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब फरवरी 2026 में साकेत की निचली अदालत ने बीना मोदी और ललित भसीन को समन जारी किया। इस आदेश को चुनौती देते हुए दोनों पक्ष पहुंचे और समन रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट में क्या हुआ
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए—
- समीर मोदी को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा गया।
- को भी मामले पर जवाब देने के लिए कहा गया।
- अगली सुनवाई जुलाई 2026 के लिए तय की गई है।
साथ ही, अदालत ने तब तक के लिए निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी।
पक्षकारों की दलीलें
बीना मोदी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि समन आदेश तथ्यों पर आधारित नहीं है और उनकी मुवक्किल को अनुचित रूप से आरोपी बनाया गया है।
वहीं, ललित भसीन का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता ने रखा।
रोहतगी ने अपनी दलील में सीसीटीवी फुटेज और बोर्ड मीटिंग का हवाला देते हुए कहा कि यदि समीर मोदी की उंगली वास्तव में टूटी होती, तो वे बैठक के दौरान दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने में सक्षम नहीं होते।
अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बनर्जी ने जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि चोट गंभीर थी, तो संबंधित व्यक्ति ने लंबी बैठक के दौरान इसका उल्लेख क्यों नहीं किया।
पुलिस की भूमिका
ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में आगे की कार्रवाई नहीं बढ़ाई गई। इसके बावजूद एफआईआर के आधार पर निचली अदालत द्वारा समन जारी किया गया था।
विश्लेषण
यह विवाद केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉर्पोरेट जगत में आंतरिक टकराव और कानूनी रणनीतियों की जटिलता को भी उजागर करता है। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश से बीना मोदी और ललित भसीन को राहत मिली है, लेकिन जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।