नहर विभाग की लापरवाही का कहर: शारदा सहायक नहर की पटरी फटने से हजारों बीघा फसल तबाह

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण सामने आया है। लाली का बाग और फूलपुर देवर पट्टी के बीच स्थित शारदा सहायक नहर की पटरी टूटने से किसानों की महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में बर्बाद हो गई। यह घटना न केवल कृषि व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि नहर विभाग की कार्यशैली पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता पैदा करती है।
बीती रात अचानक नहर की पटरी में रिसाव शुरू हुआ। प्रारंभ में इसे सामान्य समझा गया, लेकिन समय रहते मरम्मत नहीं होने के कारण यह रिसाव देखते ही देखते बड़े कटाव में बदल गया। नतीजतन, नहर का तेज बहाव खेतों की ओर मुड़ गया और हजारों बीघा कृषि भूमि जलमग्न हो गई। लाली का बाग, फूलपुर देवर पट्टी, देवरपट्टी, टेकीपट्टी और रामदासपट्टी जैसे कई गांव इस आपदा की चपेट में आ गए हैं।
सबसे अधिक नुकसान गेहूं की फसल को हुआ है। इस समय किसान अपनी फसल की कटाई की तैयारी में जुटे थे, लेकिन अचानक आई इस विपदा ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। खेतों में खड़ी पकी हुई फसल पूरी तरह डूब चुकी है। लगातार पानी भरे रहने से फसल के सड़ने और दानों के खराब होने का खतरा बढ़ गया है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पानी के तेज बहाव ने केवल फसल ही नहीं, बल्कि खेतों की उपजाऊ मिट्टी को भी बहा दिया है। इससे आने वाले मौसम में भी खेती प्रभावित होगी। कई किसानों का कहना है कि यह केवल एक मौसमी नुकसान नहीं, बल्कि उनकी आजीविका पर गहरा संकट है।
स्थानीय किसानों का आरोप है कि नहर की पटरी लंबे समय से कमजोर थी और कई बार इसकी मरम्मत की मांग की गई थी। बावजूद इसके, नहर विभाग ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यदि पहले ही आवश्यक मरम्मत कर दी जाती, तो इस बड़े नुकसान से बचा जा सकता था। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विभाग किसी बड़ी घटना के होने का इंतजार करता है?
घटना के बाद प्रशासन और नहर विभाग की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब प्राथमिकता पानी के बहाव को रोकने और स्थिति को नियंत्रण में लाने की है। हालांकि, किसानों का कहना है कि केवल अस्थायी समाधान से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें उचित मुआवजा और स्थायी समाधान चाहिए।
यह घटना केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में नहरों की जर्जर स्थिति की ओर इशारा करती है। यदि समय रहते इनकी मरम्मत और नियमित निगरानी नहीं की गई, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और भी बड़े स्तर पर हो सकती हैं।
सरकार और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे इस मामले को गंभीरता से लें, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें और प्रभावित किसानों को शीघ्र मुआवजा प्रदान करें। साथ ही, नहरों की नियमित जांच और रखरखाव की एक ठोस व्यवस्था बनाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचा जा सके।
अंततः, यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास के दावों के बीच यदि बुनियादी व्यवस्थाएं ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता—विशेषकर किसानों—का भविष्य कैसे सुरक्षित रह सकता है।