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जीवन रक्षक दवाओं की कीमत: सरकार की नीति और नियंत्रण व्यवस्था

भारत में आम जनता को सस्ती और आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। विशेष रूप से जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण नीतियां और नियम लागू किए हैं। वर्तमान में दवाओं की कीमतें राष्ट्रीय औषधि मूल्य नीति, 2012 के आधार पर निर्धारित की जाती हैं, जिसके तहत औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO, 2013) लागू किया गया है।

इस व्यवस्था के तहत (एनपीपीए) एक प्रमुख भूमिका निभाता है। एनपीपीए दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली शीर्ष संस्था है, जो यह सुनिश्चित करती है कि आवश्यक और जीवन रक्षक दवाएं आम लोगों को उचित कीमत पर उपलब्ध हों।

डीपीसीओ, 2013 के प्रमुख प्रावधान

डीपीसीओ, 2013 के अनुसार, सरकार ने कुछ दवाओं को “अनुसूची-I” में शामिल किया है। ये वे दवाएं हैं जो राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) का हिस्सा होती हैं। एनपीपीए इन दवाओं की अधिकतम कीमत (ceiling price) तय करता है।

इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

आम जनता को क्या लाभ?

इस नीति का सबसे बड़ा लाभ आम नागरिकों को मिलता है:

सरकार का दृष्टिकोण

रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि सरकार दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डीपीसीओ, 2013 के तहत तय प्रावधानों के अनुसार ही दवाओं की कीमतें विनियमित की जा रही हैं।

निष्कर्ष

जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करना केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी भी है। डीपीसीओ, 2013 और एनपीपीए की सक्रिय भूमिका के कारण भारत में आवश्यक दवाएं आम लोगों की पहुंच में बनी हुई हैं। आगे भी सरकार से यही अपेक्षा की जाती है कि वह इस दिशा में और मजबूत कदम उठाए, ताकि हर नागरिक को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मिल सके।

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