भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को सांस्कृतिक, जैव-विविधता और जनजातीय परंपराओं के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस क्षेत्र के समग्र विकास के लिए शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने हेतु “उत्कृष्टता केंद्र” (Centre of Excellence – CoE) की भूमिका अहम होती है। हाल ही में संसद में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में ने इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जो वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा को स्पष्ट करती है।

वर्तमान स्थिति: कोई नया उत्कृष्टता केंद्र नहीं
पिछले पाँच वर्षों के दौरान मंत्रालय ने पूर्वोत्तर राज्यों में किसी भी संगठन को उत्कृष्टता केंद्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि इस क्षेत्र में संस्थागत अनुसंधान और नवाचार के विस्तार में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है।
इसके अतिरिक्त, पिछले तीन वर्षों से में भी कोई उत्कृष्टता केंद्र (CoE) परियोजना संचालित नहीं हो रही है, जो कि चिंता का विषय है, क्योंकि असम पूर्वोत्तर का एक प्रमुख शैक्षणिक और शोध केंद्र माना जाता है।
एक उल्लेखनीय पहल: एनआईपीईआर गुवाहाटी की परियोजना
हालांकि, इस अवधि में एक महत्वपूर्ण शोध कार्य अवश्य सामने आया है। ने वर्ष 2022 में एक व्यापक परियोजना की अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य था:
- पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय आबादी में प्रचलित पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों का अध्ययन
- पारंपरिक औषधियों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण
- इन औषधीय पद्धतियों का वैज्ञानिक सत्यापन
यह अध्ययन न केवल पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने में सहायक है, बल्कि आधुनिक चिकित्सा के साथ उसके समन्वय की संभावनाएँ भी खोलता है।
चुनौतियाँ
पूर्वोत्तर क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्रों की कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- भौगोलिक और अवसंरचनात्मक बाधाएँ
- सीमित शोध संसाधन और निवेश
- संस्थागत सहयोग की कमी
- स्थानीय स्तर पर प्रतिभा का पलायन
इन चुनौतियों के कारण क्षेत्र में उच्च स्तरीय अनुसंधान और नवाचार की गति धीमी रही है।
संभावनाएँ और आगे की दिशा
पूर्वोत्तर क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं, विशेषकर:
- पारंपरिक चिकित्सा और हर्बल उत्पाद
- जैव-विविधता आधारित अनुसंधान
- जनजातीय ज्ञान प्रणाली
- सतत विकास मॉडल
सरकार यदि इन क्षेत्रों में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने पर ध्यान देती है, तो यह न केवल स्थानीय विकास को गति देगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी नवाचार को बढ़ावा देगा।
निष्कर्ष
पूर्वोत्तर क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्रों की वर्तमान स्थिति अपेक्षाकृत निष्क्रिय रही है, लेकिन जैसे संस्थानों की पहल यह दर्शाती है कि सही दिशा में प्रयास किए जाएँ तो इस क्षेत्र में अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।
आवश्यकता है कि और अन्य संबंधित संस्थाएँ मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ, ताकि पूर्वोत्तर भारत ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार का सशक्त केंद्र बन सके।