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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध नहीं माना, सुरक्षा के दिए निर्देश

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और चर्चित फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप (सहजीवन) कोई अपराध नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे संबंधों में रह रहे वयस्कों को अपनी पसंद से जीवन जीने का पूरा अधिकार है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।

मामला क्या था?

यह मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा था जो बिना शादी के साथ रह रहा था और उन्हें अपने परिवार से जान का खतरा था। जोड़े ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर सुरक्षा की मांग की थी। उनका कहना था कि परिवार के सदस्य उनके रिश्ते का विरोध कर रहे हैं और ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) की आशंका है।

कोर्ट का रुख

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि भारत का संविधान हर वयस्क नागरिक को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप कानून के खिलाफ नहीं है और इसे अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता।

कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और किसी भी तरह की धमकी या हिंसा की स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जाए।

ऑनर क्राइम पर सख्त टिप्पणी

अदालत ने ऑनर क्राइम जैसे मामलों पर भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि समाज या परिवार के नाम पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना या हिंसा करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई करेगा।

सामाजिक और कानूनी महत्व

यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी एक बड़ा संदेश देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बदलते समय के साथ न्यायपालिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों को प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय उन लोगों के लिए राहत लेकर आया है जो अपनी पसंद से जीवन जीना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक दबाव या पारिवारिक विरोध का सामना कर रहे हैं। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि कानून हर व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों।

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