
देश में एक बार फिर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच वैचारिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने Supreme Court of India के उन ऐतिहासिक फैसलों पर सवाल उठाए हैं, जिनमें व्यभिचार (adultery) और समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था। सरकार का कहना है कि ये फैसले “अच्छे कानून” नहीं माने जा सकते और इनमें “संवैधानिक नैतिकता” की व्याख्या अत्यधिक व्यक्तिपरक (subjective) है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में दो बड़े फैसले सुनाए थे। पहला, व्यभिचार से जुड़े भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया गया, जिससे इसे अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया। दूसरा, समलैंगिक संबंधों को अपराध बनाने वाली धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों को वैध करार दिया गया।
इन फैसलों को उस समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और गरिमा के अधिकार की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना गया था।
केंद्र सरकार की आपत्ति
केंद्र सरकार ने हाल ही में अदालत में दायर अपने पक्ष में कहा कि इन फैसलों में “संवैधानिक नैतिकता” की जो व्याख्या की गई है, वह एक निश्चित और सार्वभौमिक मानक पर आधारित नहीं है। सरकार का तर्क है कि कानून बनाते समय सामाजिक नैतिकता, परंपराएं और व्यापक जनमत को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सरकार के अनुसार, केवल न्यायिक व्याख्या के आधार पर ऐसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को तय करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हो सकता।
संवैधानिक नैतिकता बनाम सामाजिक नैतिकता
यह विवाद मुख्य रूप से “संवैधानिक नैतिकता” और “सामाजिक नैतिकता” के बीच संतुलन को लेकर है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में बार-बार कहा है कि संविधान के मूल सिद्धांत—जैसे स्वतंत्रता, समानता और गरिमा—किसी भी सामाजिक या पारंपरिक नैतिकता से ऊपर हैं।
वहीं केंद्र का मानना है कि समाज की मान्यताओं और सांस्कृतिक मूल्यों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले भारत के संविधान की आत्मा के अनुरूप हैं और उन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों को मजबूत किया है। दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि न्यायपालिका को ऐसे मामलों में सीमित दायरे में रहकर विधायिका को अधिक भूमिका देनी चाहिए।
आगे क्या?
इस मुद्दे पर आने वाले समय में और गहन बहस देखने को मिल सकती है। यदि यह मामला पुनर्विचार या किसी नई याचिका के जरिए फिर से अदालत में आता है, तो यह भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों पर सवाल उठाना केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि यह समाज, संविधान और लोकतंत्र के बीच संतुलन की बहस है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में अदालत और सरकार इस संवेदनशील विषय पर किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
