भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, जहाँ सदियों से खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का मूल आधार रही है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि कृषि हमारी समृद्धि की नींव है और किसान हमारे “अन्नदाता” हैं। यह शब्द अपने आप में किसान के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि वह न केवल देश की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करता है, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करता है।
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया संस्कृत सुभाषित—
“कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥”
इस श्लोक में कृषि को धन देने वाली, बुद्धि को शुद्ध करने वाली और समस्त जीवों के जीवन का आधार बताया गया है। इसका भावार्थ यह है कि किसान, जो अन्न उत्पन्न करता है, वह वास्तव में सबसे बड़ा दाता है। क्योंकि अन्न के बिना जीवन संभव नहीं है, इसलिए किसान का योगदान अन्य सभी दानों से श्रेष्ठ माना गया है।
आज के समय में जब तकनीकी प्रगति और औद्योगीकरण तेजी से बढ़ रहा है, तब भी कृषि का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि बदलते समय के साथ आधुनिक तकनीकों, बेहतर बीज, सिंचाई व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के माध्यम से कृषि को और सशक्त बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री का यह संदेश इसी दिशा में जागरूकता बढ़ाने और किसानों के सम्मान को और मजबूत करने का प्रयास है।
किसानों की मेहनत और समर्पण ही देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। चाहे मौसम की चुनौतियाँ हों या बाजार की अनिश्चितताएँ, किसान हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य का पालन करता है। यही कारण है कि उन्हें राष्ट्र की रीढ़ कहा जाता है।
अंततः, यह सुभाषित हमें यह सीख देता है कि हमें किसानों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। उनके योगदान को समझना और उन्हें सहयोग देना हर नागरिक का कर्तव्य है। जब किसान सशक्त होगा, तभी देश सशक्त और समृद्ध बनेगा।
