
बाबागंज (प्रतापगढ़)। भीषण गर्मी के बीच जहां एक ओर सरकार मनरेगा के माध्यम से ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बाबागंज ब्लॉक से सामने आ रही तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। ब्लॉक की 67 ग्राम पंचायतों में से केवल 25 पंचायतों में ही तालाब खुदाई का कार्य प्रगति पर दिखाया जा रहा है, जबकि बाकी पंचायतों में जमीनी स्तर पर काम लगभग नदारद बताया जा रहा है।
कागज़ों में रोजगार, जमीनी हकीकत अलग
ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बाबागंज ब्लॉक में 1301 अकुशल श्रमिकों को कार्यरत दर्शाया गया है। लेकिन ग्रामीणों और स्थानीय स्रोतों का दावा है कि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। कई गांवों में न तो कोई कार्य चल रहा है और न ही मजदूरों की मौजूदगी दिखाई दे रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि काम के अभाव और भुगतान में देरी के कारण अधिकांश मजदूर रोज़गार की तलाश में ईंट-भट्ठों और अन्य शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब गांवों में काम ही नहीं हो रहा, तो फिर ये 1301 मजदूर आखिर कहां कार्यरत हैं?
चार महीने से भुगतान लंबित
मजदूरों ने बताया कि उन्हें आखिरी बार जनवरी के प्रथम सप्ताह में मजदूरी का भुगतान मिला था। इसके बाद से लगभग चार महीने बीत जाने के बावजूद उन्हें उनकी मेहनत की कमाई नहीं मिल सकी है। भुगतान में इस देरी ने मजदूरों की आर्थिक स्थिति को और भी बदतर बना दिया है।
ग्राम प्रधानों पर भी उठ रहे सवाल
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब गांवों में काम नहीं हो रहा और मजदूर पलायन कर चुके हैं, तब भी सरकारी रिकॉर्ड में कार्य जारी दिखाया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ग्राम प्रधानों को आखिर मजदूर कहां से मिल रहे हैं? क्या यह सिर्फ कागज़ों में ही मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की जा रही है?
अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल
ग्रामीणों ने ब्लॉक में तैनात अधिकारियों—बीडीओ, डीसी मनरेगा और सीडीओ प्रतापगढ़ की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि धरातल पर काम न के बराबर है, लेकिन सरकारी पोर्टल पर सभी कार्य सुचारु रूप से संचालित दिखाए जा रहे हैं।
क्या मनरेगा बन गया आंकड़ों का खेल?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या मनरेगा योजना में अब मजदूरों की जगह सिर्फ आंकड़ों का खेल चल रहा है? क्या भुगतान की प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की जा रही है या फिर सिस्टम में कहीं बड़ी गड़बड़ी है?
जांच की उठी मांग
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं की गई तो यह मामला बड़े घोटाले का रूप ले सकता है।
गर्मी में बेरोजगारी का संकट
मई-जून की भीषण गर्मी में जहां मनरेगा ग्रामीणों के लिए जीवनरेखा साबित हो सकती है, वहीं इस तरह की अनियमितताएं ग्रामीणों के सामने रोज़गार का गंभीर संकट खड़ा कर रही हैं।
फिलहाल बाबागंज ब्लॉक में एक ही चर्चा है—मनरेगा में काम कम, कागज़ी खेल ज्यादा। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और सच्चाई कब तक सामने आती है।
