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थाईलैंड में 5वां विश्व लघु मत्स्य पालन सम्मेलन: वैश्विक मंच पर भारत की प्रभावी उपस्थिति

संकेतिक तस्वीर

थाईलैंड के हुआ हिन शहर में आयोजित 5वें विश्व लघु मत्स्य पालन सम्मेलन में भारत ने सक्रिय और सार्थक भागीदारी दर्ज कराते हुए वैश्विक मत्स्य समुदाय के सामने अपनी नीतियों और दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत किया। 27 से 30 अप्रैल 2026 तक चलने वाले इस सम्मेलन में करीब 50 देशों के 300 से अधिक प्रतिनिधि एकत्र हुए हैं, जहाँ 45 तकनीकी सत्रों के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मत्स्य विभाग के केंद्रीय सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने किया।

सम्मेलन का व्यापक दृष्टिकोण

इस वर्ष सम्मेलन का केंद्रीय विषय “न्यायपूर्ण सद्भाव, युवा-उन्मुख भविष्य और पुनर्योजी ज्ञान के माध्यम से लघु मत्स्य पालन को सशक्त बनाना” रखा गया है। इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन को साधते हुए मत्स्य क्षेत्र को टिकाऊ बनाना है।

सम्मेलन में विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग, संघर्षों के समाधान और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा पर चर्चा हो रही है। साथ ही, युवाओं को इस क्षेत्र में आकर्षित करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि भविष्य में मत्स्य पालन एक आधुनिक और नवाचार-आधारित क्षेत्र के रूप में विकसित हो सके।

भारत की नीतिगत प्राथमिकताएँ

भारत ने इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर समावेशी विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन को अपनी प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस बात पर बल दिया कि छोटे मछुआरों, महिलाओं और तटीय समुदायों को नीति-निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए, जिससे विकास के लाभ समान रूप से वितरित हो सकें।

इसके साथ ही, भारत ने इकोसिस्टम आधारित प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित किया, जिसमें समुद्री जैव विविधता की रक्षा करते हुए संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित किया जाता है। बदलते जलवायु परिदृश्य को देखते हुए भारत ने ऐसी रणनीतियों पर भी जोर दिया जो पर्यावरण के अनुकूल हों और दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करें।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में पहल

सम्मेलन के दौरान भारत ने कई देशों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएँ कर सहयोग के नए आयाम तलाशे। इन चर्चाओं में तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान, अनुसंधान में साझेदारी और समुद्री उत्पादों के व्यापार को बढ़ावा देने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर सतत मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए साझा रणनीतियाँ तैयार करने पर भी सहमति बनी। यह सहयोग न केवल आर्थिक विकास को गति देगा, बल्कि पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक समावेशन को भी मजबूती प्रदान करेगा।

निष्कर्ष

थाईलैंड में आयोजित इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में भारत की भागीदारी यह स्पष्ट करती है कि देश लघु मत्स्य पालन को केवल एक आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और युवाओं के सशक्तिकरण के एक माध्यम के रूप में देखता है।

भारत का यह दृष्टिकोण वैश्विक समुदाय के लिए एक सकारात्मक संदेश है कि भविष्य का मत्स्य क्षेत्र वही होगा, जो समावेशी, टिकाऊ और नवाचार-आधारित होगा।

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