मामले की शुरुआत तब हुई जब इलाहाबाद बैंक के पूर्व कर्मचारी आर.एस. सैनी ने बैंक के दो कर्मचारियों की विभागीय जांच में “डिफेंस असिस्टेंट” के रूप में भाग लिया। जांच शुरू होने के समय वे बैंक की सेवा में थे और उन्हें अनुशासनात्मक प्राधिकारी से विधिवत अनुमति प्राप्त थी। हालांकि, जांच प्रक्रिया के दौरान वे 30 नवंबर 2001 को सेवानिवृत्त हो गए। इसके बावजूद उन्होंने जांच कार्यवाही में भाग लेना जारी रखा। प्रारंभिक अवधि तक बैंक ने उन्हें TA/DA का भुगतान किया, लेकिन बाद में बिना किसी लिखित आदेश के भुगतान रोक दिया गया।
इसके बाद आर.एस. सैनी ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33C(2) के तहत दावा दायर करते हुए कहा कि विभागीय जांच में भाग लेने के दौरान उन्हें हुए खर्च की प्रतिपूर्ति की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक ने स्वयं उन्हें डिफेंस असिस्टेंट के रूप में जारी रहने दिया था, इसलिए खर्च वहन करना भी बैंक की जिम्मेदारी थी।
बैंक की ओर से दलील दी गई कि सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी और बैंक के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध समाप्त हो जाता है, इसलिए TA/DA का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। बैंक ने यह भी कहा कि द्विपक्षीय समझौते के अनुसार यदि जांच उसी राज्य में हो रही हो जहां डिफेंस असिस्टेंट रहता है, तो उसे TA/DA नहीं दिया जा सकता। इसके अतिरिक्त बैंक ने दावा किया कि धारा 33C(2) केवल पहले से स्थापित अधिकारों की गणना के लिए है, नए अधिकार तय करने के लिए नहीं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि वे ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी थे और ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के तहत सेवानिवृत्ति के बाद भी यूनियन प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर सकते थे। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक ने कुछ समय तक भुगतान जारी रखकर उनके अधिकार को स्वीकार किया था।
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय श्रम न्यायाधिकरण के फैसलों में तभी हस्तक्षेप करता है जब उसमें गंभीर कानूनी त्रुटि, अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन या स्पष्ट अन्याय दिखाई दे। अदालत ने माना कि यह विवाद केवल तकनीकी नहीं बल्कि न्यायसंगत अधिकारों से जुड़ा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय जांच में प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी गई थी और उसकी भूमिका सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रही, तो केवल सेवा निवृत्ति के आधार पर उसके सभी वैधानिक लाभ समाप्त नहीं माने जा सकते। खासतौर पर तब, जब बैंक स्वयं उसकी सेवाएं लेता रहा हो।
यह फैसला श्रमिक अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि संस्थाएं अपने कर्मचारियों या पूर्व कर्मचारियों के साथ मनमाने तरीके से व्यवहार नहीं कर सकतीं। यदि किसी व्यक्ति को आधिकारिक रूप से कोई जिम्मेदारी दी गई है, तो उससे जुड़े वैध खर्चों का भुगतान भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
यह निर्णय भविष्य में उन मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जहां सेवानिवृत्त कर्मचारी विभागीय या यूनियन संबंधी कार्यों में भाग लेते हैं। श्रम कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा तथा संस्थागत जवाबदेही दोनों को मजबूत करता है।
