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भारत की रक्षा शक्ति को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और बड़ा अध्याय जुड़ गया है। और ने आंध्र प्रदेश के में कई महत्वपूर्ण एयरोस्पेस एवं रक्षा परियोजनाओं का शिलान्यास कर देश की सैन्य तकनीकी क्षमता को नई गति देने का संदेश दिया। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भूमि पूजन कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें रक्षा क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हुए।

इन परियोजनाओं में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला “कोर इंटीग्रेशन एंड फ्लाइट टेस्टिंग सेंटर” है, जिसे भविष्य की रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया जा रहा है। यह अत्याधुनिक केंद्र भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों के परीक्षण, तकनीकी एकीकरण और उन्नत उड़ान परीक्षणों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। विशेष रूप से देश के बहुप्रतीक्षित पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम “एएमसीए” यानी के विकास में यह केंद्र अहम योगदान देगा।

यह परियोजना केवल एक रक्षा ढांचा नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षा का प्रतीक मानी जा रही है। इसके माध्यम से आधुनिक एवियोनिक्स, स्टेल्थ तकनीक, अत्याधुनिक सेंसर और युद्धक प्रणालियों के परीक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जाएगा। इससे भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने में बड़ी मदद मिलेगी।

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब रक्षा उपकरणों का केवल खरीदार नहीं, बल्कि आधुनिक रक्षा तकनीक विकसित करने वाला वैश्विक शक्ति केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में किए जा रहे निवेश आने वाले वर्षों में देश की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएंगे। उनके अनुसार, यह परियोजना भारत की रणनीतिक शक्ति और तकनीकी क्षमता दोनों को नई ऊंचाई देगी।

वहीं मुख्यमंत्री ने कहा कि आंध्र प्रदेश को देश का प्रमुख एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण हब बनाने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि इन परियोजनाओं से स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे, साथ ही क्षेत्र में औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों को भी गति प्राप्त होगी।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पुट्टपर्थी में स्थापित होने वाला यह अत्याधुनिक केंद्र आने वाले समय में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास क्षेत्र को नई दिशा देगा। इससे न केवल स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों को मजबूती मिलेगी, बल्कि भारत वैश्विक रक्षा तकनीक के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाने में सफल होगा। आने वाले वर्षों में देश के प्रमुख रक्षा और एयरोस्पेस केंद्रों में शामिल हो सकता है।

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