
भारत के शेयर बाजार में डीमैट अकाउंट्स की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है, लेकिन इसकी पैठ अब भी वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है। मोटिलाल ओसवाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डीमैट अकाउंट्स की पैठ केवल 12 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
डीमैट अकाउंट्स की पैठ और इसकी वृद्धि
रिपोर्ट में कहा गया है, “भारत में डीमैट अकाउंट्स की पैठ 12 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह 62 प्रतिशत है। डिस्काउंट ब्रोकर्स अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से इस परिदृश्य को बदल रहे हैं। वे निचले स्तर के शहरों और कस्बों में इक्विटी के प्रति जागरूकता और स्वीकृति बढ़ाने में सहायक हो रहे हैं।”
हाल ही में, भारत में डीमैट अकाउंट्स की संख्या लगभग 179 मिलियन तक पहुंच गई है, जो वित्तीय वर्ष 2022 में 90 मिलियन थी। यह संख्या मात्र दो वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और छोटे शहरों की भूमिका
इस वृद्धि का मुख्य श्रेय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करने वाले डिस्काउंट ब्रोकर्स को जाता है, जिन्होंने छोटे शहरों और कस्बों में इक्विटी निवेश को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाए हैं।
ट्रेडिंग वॉल्यूम में हुआ अभूतपूर्व इजाफा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ट्रेडिंग वॉल्यूम में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले पांच वर्षों में सभी सेगमेंट्स—इक्विटी फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O), कैश और कमोडिटीज—में औसत दैनिक कारोबार (एडीटीओ) कई गुना बढ़ा है। इनमें सबसे बड़ा योगदान ऑप्शंस सेगमेंट का रहा है, जो इस वृद्धि का प्रमुख कारक बनकर उभरा है।
भविष्य की संभावनाएं
डीमैट अकाउंट्स की संख्या में यह तेजी भारतीय शेयर बाजार की क्षमता और संभावनाओं को दर्शाती है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को अभी लंबा सफर तय करना होगा। डिजिटल तकनीक और छोटे शहरों में बढ़ती भागीदारी से आने वाले वर्षों में इस अंतर को कम करने की उम्मीद है।
निष्कर्ष
भारत में डीमैट अकाउंट्स की वृद्धि देश की आर्थिक प्रगति और निवेशकों की बढ़ती रुचि का प्रमाण है। यदि जागरूकता और डिजिटल पहुंच को और बेहतर बनाया जाए, तो भारत न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि वैश्विक मानकों पर भी अपनी जगह बना सकता है।