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शी जिनपिंग की प्रभुता अब डगमगाई: चीन की बढ़ती मुश्किलें और असंतोष

एक समय था जब शी जिनपिंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और चीन की राजनीति में सर्वव्यापक, अछूत और अनुपम दिखते थे। 2012 में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने अपने लिए ऐसा विशाल मंच तैयार किया, जिसे वे और उनकी पार्टी ने ही स्थापित किया था।

उस समय, ऐसा प्रतीत होता था कि शी की नीतियां और नेतृत्व सर्वग्राही हैं, और चीन की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति लगातार मजबूत हो रही है। शुरू में उन्हें कोई गलती नहीं दिखाई देती थी, क्योंकि चीन तेजी से उभरता हुआ शक्ति केंद्र बनता जा रहा था।

लेकिन धीरे-धीरे उनकी चमक फीकी पड़ने लगी है। आज, उनकी छवि और उनकी नीति पर सवाल उठने लगे हैं।

कोविड-19 महामारी का खराब प्रबंधन

शी जिनपिंग की सबसे बड़ी विफलता रही है कोविड-19 महामारी का प्रबंधन। कोरोना वायरस की शुरुआत में चीन ने महामारी को छिपाने की कोशिश की, जिसने न केवल चीन की छवि को नुकसान पहुंचाया बल्कि दुनिया भर में इसके असर की व्यापकता को भी बढ़ाया। चीन की आर्थिक स्थिति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा है।

सख्त समाज नियंत्रण और निगरानी प्रणाली

शी का एक और विवादास्पद कदम रहा है चीन में नागरिकों की स्वतंत्रता पर बढ़ते नियंत्रण और निगरानी प्रणाली की स्थापना। सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक पर उनकी सरकार का शिकंजा लगातार कसता गया है। यही नहीं, चीन में प्रेस की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी लगातार दमन हुआ है, जिससे चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि और कमजोर हुई है।

रूसी समर्थक नीति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता

शी जिनपिंग ने जो अगला कदम उठाया, वह था रूस के प्रति लगातार समर्थन और यूरोप व अमेरिका के साथ चीन की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता। उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन के युद्ध मशीनरी का खुलकर समर्थन किया, जो न केवल चीन की विदेश नीति को जटिल बना रहा है, बल्कि यूरोप और अमेरिका के साथ उनके रिश्तों को भी लगातार खराब कर रहा है।

भारत, साउथ चाइना सी और ताइवान पर चीन की विस्तारवादी नीति

चीन ने न केवल भारत के साथ सीमा विवाद को बढ़ाया, बल्कि दक्षिण चीन सागर और ताइवान पर भी अपनी विस्तारवादी नीतियों को अपनाया है। चीन का यह आक्रमणकारी रवैया न केवल भारत को परेशान कर रहा है, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया और अमेरिका को भी गहरे अस्थिर कर रहा है। शी की इस नीति ने उन्हें न केवल पड़ोसियों के विरोध का सामना करना पड़ा है, बल्कि यूरोप और अमेरिका की चिंता का भी कारण बन गया है।

मानवाधिकारों का उल्लंघन और हांगकांग पर दमन

शी जिनपिंग की सरकार ने अपनी नीतियों के तहत तिब्बत और शिनजियांग में मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन किया है। यही नहीं, हांगकांग पर भी चीन का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर पड़ रहा है।

पीएलए की स्थिति और भ्रष्टाचार

चीन की सेना, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA), ने भी अपनी कई गतिविधियों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चौंकाया है। लेकिन इन दिनों, PLA के भीतर भी भारी असंतोष और भ्रष्टाचार फैल चुका है। राजनीतिक हस्तक्षेप और नेतृत्व के कमजोर रवैये ने सेना को भी कमजोर किया है, जिससे चीन की सैन्य प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठने लगे हैं।

निष्कर्ष

शी जिनपिंग की अब तक की छवि और प्रभुता डगमगा गई है। उनकी नीतियां अब न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी सवालों के घेरे में हैं। चीन की बढ़ती समस्याएं और उनकी सरकार की असफलताएं शी के नेतृत्व को कमजोर कर रही हैं और देश को आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अस्थिरता की ओर ले जा रही हैं। शी जिनपिंग के सामने अब बड़ी चुनौतियां हैं, जिन्हें उन्हें शीघ्र हल करना होगा, नहीं तो उनकी सत्ता और उनकी प्रभावशीलता में और भी कमी आएगी।

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