
भारत के पुनर्चक्रण क्षेत्र को सशक्त और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए खान मंत्रालय और जवाहरलाल नेहरू एल्युमीनियम अनुसंधान विकास एवं डिजाइन केंद्र (जेएनएआरडीडीसी) ने हैदराबाद में एक विशेष संवादात्मक बैठक का आयोजन किया। यह बैठक अलौह (Non-Ferrous) धातु पुनर्चक्रण क्षेत्र से जुड़े विभिन्न हितधारकों, व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं के साथ आयोजित की गई थी।
कार्यशाला का उद्देश्य और महत्व
इस संवाद का मुख्य उद्देश्य पुनर्चक्रण उद्योग से जुड़े जमीनी स्तर की चुनौतियों को प्रत्यक्ष रूप से समझना और उनके समाधान हेतु हितधारकों को तकनीकी व नियामक सहायता प्रदान करना था। यह बैठक उस व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा थी जिसमें भारत को एक हरित, स्वावलंबी और सतत विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना है।
इस दौरान जेएनएआरडीडीसी ने बताया कि पुनर्चक्रण उद्योग पारंपरिक खनन की तुलना में बहुत कम ऊर्जा की खपत करता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी आती है। यह जलवायु परिवर्तन की दिशा में भारत की प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने की दिशा में एक प्रभावी कदम है।
जेएनएआरडीडीसी की भूमिका और दृष्टिकोण
जेएनएआरडीडीसी के निदेशक डॉ. अनुपम अग्निहोत्री ने कहा कि संस्थान स्वयं को एक प्रवर्तक नहीं बल्कि उद्योग का मित्र और सहभागी मानता है। उन्होंने रीसाइक्लिंग सेक्टर को अनौपचारिक और खंडित संचालन से औपचारिक, तकनीकी रूप से उन्नत और गुणवत्ता-सचेत ढांचे में परिवर्तित करने पर जोर दिया।
पुनर्चक्रण संवर्धन प्रभाग के अंतर्गत एक विशेष टीम गठित की गई है, जो अत्याधुनिक प्रदर्शन संयंत्रों की स्थापना कर उन्नत तकनीकों को प्रदर्शित कर रही है। साथ ही, कॉमन फैसिलिटी सेंटर्स (CFCs) की स्थापना कर छोटे रीसाइक्लर्स को आवश्यक तकनीकी सहायता और बुनियादी ढांचे की सुविधा प्रदान की जा रही है।
उद्योग निकायों की सक्रिय भागीदारी
इस कार्यशाला में तेलंगाना एल्युमीनियम यूटेंसिल्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TAUMA), एल्युमीनियम एक्सट्रूडर एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ALEMAI) और मैटेरियल रिसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MRAI) जैसे प्रमुख संगठन सक्रिय रूप से शामिल हुए। इनकी भागीदारी ने दर्शाया कि उद्योग इस बदलाव के लिए तत्पर और तैयार है।
कार्यक्रम में जेएनएआरडीडीसी ने घरेलू उपयोग के लिए विकसित की गई एल्युमीनियम पुनर्चक्रण तकनीकों और मिश्र धातु अनुसंधान की झलक भी प्रस्तुत की।
खुला मंच और सरकारी सहयोग
इस ओपन फोरम ने पुनर्चक्रण से जुड़े उद्यमियों को अपनी तकनीकी, प्रशासनिक और नियामक समस्याओं को खुलकर साझा करने का मंच दिया। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के प्रतिनिधि ने प्रतिभागियों को गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) के बारे में जानकारी दी जो इस क्षेत्र में अनिवार्य हैं।
यह पहल खान मंत्रालय की उस दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है जिसमें भारत को वैश्विक स्तर पर टिकाऊ संसाधन उपयोग का नेतृत्वकर्ता बनाना है। यह कार्यशाला आत्मनिर्भर भारत, कार्बन तटस्थता और $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही है।
निष्कर्ष
भारत में धातु पुनर्चक्रण उद्योग को औपचारिक, संगठित और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाने के लिए जेएनएआरडीडीसी और खान मंत्रालय की यह संयुक्त पहल अत्यंत सराहनीय है। यह न केवल पर्यावरणीय लाभ सुनिश्चित करेगी बल्कि देश के आर्थिक ढांचे को भी मजबूत करेगी।
इस तरह की निरंतर संवादात्मक कार्यशालाएं और तकनीकी सहयोग भारत को पुनर्चक्रण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाने में सहायक सिद्ध होंगी।