
चित्रकूट, उत्तर प्रदेश — उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के एक छोटे से गांव में हाल ही में जो हृदयविदारक घटना सामने आई, उसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला न केवल ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को उजागर करता है, बल्कि झोलाछाप डॉक्टरों के बढ़ते प्रभाव और उनकी लापरवाही से उपजी त्रासदियों की भयावहता को भी सामने लाता है।
घटना का विवरण
घटना तब घटी जब गांव के रहने वाले एक परिवार का मासूम बच्चा सतिन (उम्र लगभग 5 वर्ष) अचानक अस्वस्थ हो गया। बच्चे को हल्का बुखार और थकावट की शिकायत थी। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और आसपास किसी पंजीकृत डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। मजबूरीवश परिजन गांव में ही एक स्थानीय तथाकथित “डॉक्टर” के पास ले गए, जो मेडिकल डिग्री से वंचित था और वर्षों से बिना किसी मान्यता के इलाज करता चला आ रहा था।
झोलाछाप डॉक्टर ने न तो बच्चे की कोई जांच की, न ही उसके लक्षणों को गंभीरता से समझा। उसने सीधे एक इंजेक्शन लगा दिया, और यहीं से बच्चे की हालत बिगड़ने लगी।
दर्दनाक अंत
इंजेक्शन दिए जाने के कुछ ही मिनटों में सतिन की सांसें तेज़ चलने लगीं, वह तड़पने लगा, और उसकी मां की गोद में छटपटाने लगा। कोई उचित प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध न होने के कारण परिजन उसे लेकर अस्पताल की ओर भागे, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। मासूम ने अपनी जान गंवा दी — उस लापरवाही के कारण जो शायद एक सामान्य जांच और सही उपचार से टल सकती थी।
लापरवाह व्यवस्था और ग्रामीण मजबूरी
यह कोई पहली घटना नहीं है। भारत के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी और जागरूकता की सीमाएं लोगों को ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाने को मजबूर कर देती हैं। ये लोग बिना किसी डिग्री या प्रशिक्षण के केवल अनुभव या गलत जानकारी के आधार पर लोगों की जान से खिलवाड़ करते हैं।
प्रशासन की चुप्पी और ज़िम्मेदारी
इस घटना के बाद परिजनों ने प्रशासन से शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह झोलाछाप डॉक्टर वर्षों से इसी तरह इलाज कर रहा था और स्थानीय स्तर पर उसकी “प्रैक्टिस” को नजरअंदाज किया जा रहा था। यदि समय रहते प्रशासन ने संज्ञान लिया होता, तो शायद आज सतिन ज़िंदा होता।
आगे क्या?
- स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय रूप से निरीक्षण करे।
- झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
- गांवों में पंजीकृत डॉक्टरों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए।
- जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि ग्रामीण सही इलाज और डॉक्टर की पहचान कर सकें।
निष्कर्ष
सतिन की मौत केवल एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र की विफलता का परिणाम है। यह समय है कि सरकार, समाज और स्वास्थ्य महकमा मिलकर ऐसे झोलाछाप इलाज के खिलाफ कड़े कदम उठाए — ताकि एक और सतिन की जान न जाए।