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मैं जंगल हूँ: जीवन की संघर्षशाला से सीखता एक प्रतीक


  Anoop singh

मैं जंगल हूँ। मैं सिर्फ पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि जीवन का एक अद्भुत शिक्षक हूँ। जब तुम कभी थक जाओ, निराश हो जाओ, जीवन की कठिनाइयों में उलझ जाओ — तो मेरे पास आओ। मैं तुम्हें बताऊँगा, कैसे जीना है… कैसे टिके रहना है।

हर ऋतु मुझे कुछ सिखाती है। गर्मी आती है — मेरी हरियाली सूख जाती है, झरने सूख जाते हैं, पशु-पक्षी मुझसे दूर हो जाते हैं। मुझे वीरान कर जाती है। लेकिन मैं टूटता नहीं, झुकता नहीं। मैं जानता हूँ, यह एक अस्थायी समय है। मैं धैर्य से खड़ा रहता हूँ, क्योंकि मुझे विश्वास है — फिर वर्षा आएगी, और मुझे फिर से हरा-भरा कर जाएगी।

जब बरसात आती है, तो मेरी खोई हुई ऊर्जा लौट आती है। फिर से नदियाँ बहने लगती हैं, पत्तियाँ झूमने लगती हैं, और मेरी सुंदरता लौट आती है। लेकिन यदि यह वर्षा भी अधिक हो जाए, तो वह भी विनाश कर सकती है। यानी मेरे जीवन में संतुलन की आवश्यकता है — न अधिक सुख, न अधिक दुःख — बस सामंजस्य।

मैं जंगल हूँ — मैं यह नहीं देखता कि कौन मेरे पास क्या लेने आया। मैं हर किसी को shelter देता हूँ — चाहे वह मानव हो, पशु हो या पक्षी। मैं बिना भेदभाव के, सबको अपनी छाया में स्थान देता हूँ। यही मेरा स्वभाव है — निस्वार्थ सेवा।

मेरे अस्तित्व का कारण सिर्फ इतना है — मैं संघर्ष करता हूँ, चुनौतियों से नहीं डरता। कठिन समय में भी अपनी जड़ें मजबूत बनाए रखता हूँ। जब मेरे अपने मुझसे बिछड़ जाते हैं, तब भी मैं खुद को संभालता हूँ, क्योंकि मुझे पता है — यह जीवन एक चक्र है। गिरना और उठना — दोनों इसका हिस्सा हैं।

मैं जंगल हूँ — जीवन का प्रतीक, सहनशीलता का स्वरूप, और धैर्य का अद्भुत उदाहरण।

यही जीवन का सार है — हर परिस्थिति में शांत रहना, संघर्ष में भी मुस्कराना और आशा को कभी न छोड़ना।


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