
वाराणसी, 24 जून 2025 — इटावा जिले में कथावाचकों से दुर्व्यवहार के एक मामले पर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के विवादास्पद बयान ने एक बार फिर जातिगत विमर्श को गरमा दिया है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार सार्वजनिक रूप से धार्मिक कथा कहने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही है। इस बयान के बाद सामाजिक व राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।
इटावा की घटना और विवाद की शुरुआत
इटावा के एक गांव में यादव समुदाय के दो कथावाचकों — मुकुटमणि और संत कुमार यादव — पर कथित रूप से ब्राह्मण बनकर कथा कहने का आरोप लगाया गया। इसके बाद गांव के कुछ लोगों ने उनका अपमान किया और उनके खिलाफ विरोध जताया। मामला तूल पकड़ने पर राजनीति भी गर्म हो गई।
शंकराचार्य का बयान
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, “जो व्यक्ति ब्राह्मण नहीं है और ब्राह्मण बनकर कथा कहता है, वह समाज और धर्म दोनों से धोखा करता है। यदि किसी ने अपनी जाति छुपाकर ऐसा किया है तो उस पर धारा 419 और 420 के तहत धोखाधड़ी का मामला दर्ज होना चाहिए।”
उनका यह भी कहना था कि शास्त्रों की दृष्टि में कथा सुनाने के लिए केवल ब्राह्मण उपयुक्त हैं, क्योंकि वे वेद-शास्त्रों का अध्ययन और जीवन पद्धति को समझते हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कथावाचकों से मुलाकात कर उन्हें सम्मानित किया और इस मामले को जातिगत भेदभाव बताया। उन्होंने कहा, “जो लोग कृष्ण की भक्ति करते हैं, उन्हें अपमानित करना सीधे धार्मिक आस्था पर हमला है।”
शंकराचार्य ने अखिलेश यादव के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि अपराध को जाति के नाम पर छिपाना उचित नहीं है।
जाति और धर्म का पुराना सवाल
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला दिया है कि क्या धार्मिक कार्यों पर किसी विशेष जाति का अधिकार है? आज के दौर में जब समाज समानता और समावेशिता की ओर बढ़ रहा है, तब ऐसे बयानों से सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।
शंकराचार्य की कावड़ यात्रा पर टिप्पणी
शंकराचार्य ने कावड़ यात्रा से जुड़ी परंपराओं पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पकाया हुआ भोजन शुद्धता की दृष्टि से विवादास्पद हो सकता है, इसलिए यात्रियों को सलाह दी कि कच्चे पदार्थ किसी भी जाति से खरीदे जा सकते हैं, पर पका हुआ भोजन ना खाएं।
बिहार चुनाव में ‘गऊ’ एजेंडा
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर उन्होंने एक अनोखी रणनीति का ऐलान किया। शंकराचार्य के अनुसार, हर सीट पर ‘गऊ’ (गाय) के नाम पर एक निर्दलीय प्रत्याशी उतारा जाएगा, जिससे यह संदेश जाए कि गाय भी एक राजनीतिक मुद्दा है।
निष्कर्ष
धार्मिक मंच से आए इस तरह के जातिगत बयानों पर समाज को सोचने की ज़रूरत है कि क्या आस्था, भक्ति और धार्मिक जिम्मेदारियों को जाति के आधार पर बांटना आज के युग में उचित है? या यह समय है जब धार्मिक क्षेत्र में भी समता, शिक्षा और समझदारी को आधार बनाना चाहिए?
“कथा” भले ही शास्त्रों से जुड़ी हो, पर उसका उद्देश्य हर मनुष्य के अंतःकरण को छूना है — न कि उसे वर्गों में बांटना।