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25 जून: भारतीय लोकतंत्र का एक काला अध्याय


Anoop singh

आज का दिन, 25 जून, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक गहरे और दुखद क्षण के रूप में दर्ज है। ठीक इसी दिन वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देशभर में आपातकाल लागू किया गया था। यह निर्णय न केवल संविधान की भावना के खिलाफ था, बल्कि भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर सीधा आघात था।

आपातकाल की घोषणा और उसका प्रभाव

25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के साथ ही पूरे देश में असाधारण हालात उत्पन्न हो गए। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया, जिसका तर्क यह दिया गया कि देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में है। लेकिन वास्तव में यह राजनीतिक विरोध को कुचलने की एक रणनीति थी।

इस दौरान:

मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई, अखबारों को बिना सरकारी मंजूरी कुछ भी छापने की अनुमति नहीं थी।

हजारों विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के जेलों में डाल दिया गया।

नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए।

न्यायपालिका पर दबाव डाला गया और संविधान के कई प्रावधानों को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया गया।

जनता का संघर्ष और लोकतंत्र की बहाली

इस अंधकारमय काल में भी लोकतंत्र के रक्षक पीछे नहीं हटे। देशभर में हजारों लोग, जिनमें नेता, छात्र, पत्रकार और आम नागरिक शामिल थे, लोकतंत्र की पुनःस्थापना के लिए संघर्षरत रहे। जेल, यातनाएं और उत्पीड़न सहते हुए भी वे झुके नहीं। 1977 में जब आम चुनाव हुए, तब जनता ने स्पष्ट संदेश दिया और कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही आपातकाल का अंत हुआ और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई।

वर्तमान में इसका महत्व

आज जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन चुका है, तो 25 जून को याद करना केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह हमें सतर्क रहने की चेतावनी भी देता है। लोकतंत्र एक स्थायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरंतर रक्षा और सक्रिय भागीदारी की मांग करता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि नागरिक स्वतंत्रताएं, प्रेस की आज़ादी, और न्यायिक स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होनी चाहिए।

निष्कर्ष

25 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर एक गहरी चोट थी। लेकिन उसी दौर में जन्मे संघर्ष और बलिदान की कहानियाँ यह भी दिखाती हैं कि भारतीय नागरिकों की लोकतांत्रिक चेतना कितनी मजबूत है। आज जब हम इस दिन को याद करते हैं, तो यह हमारे लिए एक संकल्प लेने का अवसर है — कि हम संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव सजग रहेंगे।


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