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भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा: आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक एकता का पर्व


Anoop singh

भारत की सांस्कृतिक धरोहर में रथ यात्रा एक ऐसा पर्व है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को जागृत करता है, बल्कि सामाजिक एकता और श्रद्धा का भी प्रतीक है। हर वर्ष ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विशाल उल्लास और भक्ति के साथ निकाली जाती है, जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।

भगवान जगन्नाथ: विशिष्ट स्वरूप और दिव्यता

भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। उनके साथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियाँ भी रथ पर विराजमान होती हैं। यह मूर्तियाँ लकड़ी की बनी होती हैं और हर 12 वर्षों में इनका नवीनीकरण किया जाता है, जिसे “नवकलेवर” कहा जाता है।

रथ यात्रा की शुरुआत और महत्व

रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरंभ होती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को विशेष रूप से निर्मित भव्य रथों में बैठाकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है, जो उनकी मौसी का घर माना जाता है। यह यात्रा लगभग 3 किलोमीटर लंबी होती है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व अनंत है।

श्रद्धालु रथ को खींचने का सौभाग्य पाकर स्वयं को धन्य मानते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि भगवान के रथ को खींचने से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

समरसता और समानता का प्रतीक

रथ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और समरसता का उदाहरण भी है। इस दिन जात-पात, वर्ग और धर्म का कोई भेद नहीं रहता। हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से हो, भगवान के रथ को खींच सकता है। यह पर्व एकता और सह-अस्तित्व का अनुपम संदेश देता है।

आध्यात्मिक अनुभूति और सांस्कृतिक गौरव

रथ यात्रा के दौरान मंत्रोच्चारण, ढोल-नगाड़े, शंख-ध्वनि और भजन-कीर्तन की मधुर गूंज वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है। यह उत्सव न केवल भगवान की कृपा प्राप्त करने का अवसर है, बल्कि भारतीय संस्कृति के गौरव का उत्सव भी है।

प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की शुभकामनाएं – एक प्रेरणास्रोत

हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी भारत के प्रधानमंत्री ने रथ यात्रा के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने इस पावन पर्व को सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और आत्मिक शांति का वाहक बताया। उनके संदेश से यह स्पष्ट होता है कि रथ यात्रा न केवल धार्मिक बल्कि राष्ट्रीय चेतना को भी जागृत करती है।


निष्कर्ष

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है — जो भक्ति, सेवा, और आत्म-उत्थान की ओर ले जाती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि भगवान के प्रति समर्पण, दूसरों के प्रति करुणा, और समाज में एकता का भाव ही सच्ची भक्ति है।


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