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🌍 पर्यावरण प्रदूषण: एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का अदृश्य लेकिन घातक कारण


Anoop singh

2 जुलाई 2025

आज की दुनिया एक ऐसे संकट का सामना कर रही है जो न तो हथियारों से लड़ा जा सकता है और न ही केवल दवाइयों से जीता जा सकता है – वह है एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR), यानी दवाओं के प्रति रोगाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता। यह स्वास्थ्य संकट जितना चिकित्सा से जुड़ा हुआ है, उतना ही पर्यावरण प्रदूषण से भी।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एंटीबायोटिक और अन्य रसायनों का अनियंत्रित रूप से वातावरण में रिसाव, रोगाणुओं को दवाओं के विरुद्ध लड़ने में सक्षम बना रहा है। यह प्रदूषण मुख्यतः उद्योगों, कृषि और अपशिष्ट जल के माध्यम से फैलता है, जो रोगजनक जीवाणुओं को प्रतिरोधी बनने के लिए उकसाता है।

🔬 प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:

फार्मा उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट जल, जिसमें अक्सर अधूरी या सक्रिय दवाएं पाई जाती हैं, नदियों और नालों को दूषित करता है।

पशुपालन और कृषि में अत्यधिक एंटीबायोटिक उपयोग, जिनके अंश मिट्टी और पानी में मिल जाते हैं।

अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल अपशिष्ट, जिसमें प्रतिरोधी रोगाणु और बची हुई दवाएं शामिल होती हैं।

इन सबका परिणाम यह होता है कि जल, मिट्टी और हवा में रहने वाले सूक्ष्मजीव कम मात्रा में एंटीबायोटिक के संपर्क में आकर धीरे-धीरे उनसे लड़ना सीख जाते हैं – और तब बनते हैं सुपरबग्स, जो सामान्य दवाओं से भी नहीं मरते।

⚠️ इसके गंभीर प्रभाव:

साधारण संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं।

सर्जरी, कैंसर का इलाज, और ट्रांसप्लांट जैसी प्रक्रियाएं बेहद जोखिमपूर्ण बन जाती हैं।

स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ बढ़ता है – अस्पताल में लंबा भर्ती रहना, महंगी दवाएं और आर्थिक नुकसान।

🌐 UNEP का #BeatChemicalPollution अभियान इस दिशा में चेतावनी और समाधान दोनों लेकर आया है:

औद्योगिक अपशिष्ट और अस्पताल के जल का समुचित प्रबंधन।

कृषि में जिम्मेदारीपूर्ण एंटीबायोटिक उपयोग।

कड़े पर्यावरणीय कानून और उनके पालन की निगरानी।

जल शोधन तकनीकों का विस्तार।

और सबसे महत्वपूर्ण – जन जागरूकता और वैश्विक सहयोग।

🛡️ निष्कर्ष:

अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो वो दिन दूर नहीं जब सामान्य संक्रमण का इलाज असंभव हो जाएगा। एंटीबायोटिक दवाएं, जिनका आविष्कार 20वीं सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, बेअसर हो जाएंगी। इस संकट का हल केवल डॉक्टरों या वैज्ञानिकों के हाथ में नहीं, बल्कि समाज, उद्योग और सरकार – सभी की साझा जिम्मेदारी है।

दवाओं को बचाना है तो पहले पर्यावरण को बचाइए।
यह अब केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगियों का सवाल है।



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