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🧾 डिजिटल युग में सूचना का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नियम तय करने का निर्देश दिया


Anoop singh


दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2025 को एक ऐतिहासिक निर्णय में केंद्र सरकार को निर्देशित किया कि वह सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत दी जाने वाली जानकारी को आधुनिक डिजिटल माध्यमों में उपलब्ध कराने हेतु नए नियम बनाए। यह कदम डिजिटल युग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

पृष्ठभूमि
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने यह फैसला दो विधि छात्रों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कहा गया था कि RTI जानकारी अब भी पुराने माध्यमों जैसे फ्लॉपी डिस्क और डिस्केट्स में देने का प्रावधान रखती है, जो आज की तकनीकी प्रगति के अनुरूप नहीं है।

न्यायालय की टिप्पणी और निर्देश
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान RTI नियम डिजिटल दौर की मांगों को पूरा नहीं करते हैं। इससे न केवल पारदर्शिता बाधित होती है, बल्कि यह RTI अधिनियम की मूल भावना का भी उल्लंघन करता है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को जानकारी उनके द्वारा चुने गए माध्यमों—जैसे ईमेल, पेन ड्राइव, या क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म—में उपलब्ध कराना जरूरी है, बशर्ते पर्याप्त सुरक्षा उपाय भी सुनिश्चित किए जाएं।

तीन माह की समयसीमा
अदालत ने संबंधित केंद्रीय प्राधिकरण को यह निर्देश दिया कि वह तीन महीनों के भीतर इस मुद्दे का मूल्यांकन करे और जरूरी नियमों का प्रारूप तैयार करे ताकि नागरिकों को सूचना पाने में सुगमता और सरलता प्राप्त हो सके।

याचिकाकर्ताओं की मांगें
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग रखी कि RTI शुल्क का भुगतान भी आधुनिक डिजिटल माध्यमों जैसे UPI, नेट बैंकिंग और डेबिट/क्रेडिट कार्ड से किया जा सके। इससे प्रक्रिया अधिक सुलभ और आम जनता के लिए अनुकूल बन सकेगी।

सरकार की निष्क्रियता पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि इस विषय में पहले भी कई बार संबंधित मंत्रालयों से संपर्क किया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे उन्हें अदालत का रुख करना पड़ा।

निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला इस ओर स्पष्ट संकेत देता है कि सूचना का अधिकार केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि डिजिटल युग में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का औजार है। यदि सरकार इस दिशा में समय रहते ठोस नियम बनाती है, तो यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।


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