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दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला: सीआरपीएफ स्नाइपर राइफल टेंडर पर बोली को बरकरार रखते हुए न्यायिक पारदर्शिता


Anoop singh

नई दिल्ली, 3 जुलाई 2025 — केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की स्नाइपर राइफल और गोला-बारूद की आपूर्ति से जुड़े एक अहम टेंडर विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने Stumpp Schuele Lewis Machine Tools Pvt. Ltd. की याचिका को खारिज करते हुए, टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और निष्पक्षता, पारदर्शिता तथा प्रक्रियागत सख्ती की पुष्टि की।

यह मामला उस समय उत्पन्न हुआ जब याचिकाकर्ता कंपनी ने टेंडर में अयोग्य घोषित किए जाने को चुनौती दी। उनका आरोप था कि तकनीकी परीक्षणों में उनके साथ पक्षपात किया गया तथा प्रतिस्पर्धी कंपनियों को अनुचित लाभ दिया गया। परंतु, न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी प्रक्रियाएं तय नियमों के अनुसार निष्पादित की गई थीं और याचिकाकर्ता को पूरा अवसर प्रदान किया गया था – जिसमें द्वितीय चरण का फील्ड परीक्षण भी शामिल था।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मौसम या दृश्य भ्रम (मृगतृष्णा) जैसी परिस्थितियों को तकनीकी विफलता का कारण नहीं माना जा सकता। साथ ही, न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि यदि हर असफल परीक्षण के बाद पुनः मौका दिया जाने लगे, तो यह पूरी खरीद प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला देगा और अनुचित मिसाल स्थापित करेगा।

CRPF द्वारा प्रस्तुत “मैचिंग गोला-बारूद” की परिभाषा में HPBT (होलो पॉइंट बोट टेल) राउंड्स शामिल थे, जिसे अदालत ने स्वीकार किया। सीआरपीएफ ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी प्रतिभागियों ने ट्रायल के प्रारूप और नियमों को पहले से स्वीकार किया था और याचिकाकर्ता की आपत्ति केवल असफलता के पश्चात सामने आई — जो कि पूर्वनियत विचार की बजाय एक प्रतिक्रियात्मक कदम प्रतीत होता है।

सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्णय (टाटा मोटर्स लिमिटेड बनाम भारत संघ) का हवाला देते हुए अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि कोई बोलीदाता अयोग्य घोषित कर दिया गया हो, तो उसे चयन प्रक्रिया पर आपत्ति जताने का अधिकार नहीं है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि उन्होंने परीक्षण के दौरान बॉल/लॉक बेस गोला-बारूद का उपयोग किया, जबकि प्रतियोगी HPBT राउंड्स का प्रयोग कर रहे थे, जिसे वे अनुचित मानते हैं। इसके साथ ही, उन्होंने पुणे परीक्षण के अनुकूल परिणामों और पर्यावरणीय हस्तक्षेप के नए प्रस्ताव का हवाला दिया।

इसके जवाब में केंद्र सरकार और सीआरपीएफ ने यह स्पष्ट किया कि टेंडर शर्तों के अंतर्गत HPBT राउंड्स पूरी तरह से मान्य थे। उन्होंने यह भी बताया कि सभी प्रतिभागियों ने परीक्षण प्रक्रिया पर सहमति जताते हुए प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर किए थे, और परीक्षण के समय किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं जताई गई थी।

अधिवक्ता रोहन जेटली, केंद्रीय स्थायी अधिवक्ता के रूप में, सरकार का पक्ष रखते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया कि 400 मीटर की दूरी पर बॉल/लॉक बेस और HPBT गोला-बारूद के बीच बैलिस्टिक अंतर नगण्य था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि तीसरे ट्रायल की अनुमति देने से पूरी निविदा प्रक्रिया की समयसीमा और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते।

निष्कर्ष:

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला सरकारी खरीद प्रक्रियाओं की न्यायिक पारदर्शिता, निष्पक्षता और नियमों के अनुपालन की अनिवार्यता को दोहराता है। यह उन सभी कंपनियों और प्रतिभागियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो निविदा प्रक्रियाओं की विफलता के बाद उन्हें अदालत में चुनौती देने का प्रयास करते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन और समय पर आपत्तियों की अभिव्यक्ति ही विधिसम्मत मार्ग हैं।


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